27 सितंबर 2010

सहर की चहल पहल

किसी अजनबी रात की तरह सड़क पर
जाने पहचाने चेहरे गुजर जाते है
देखते नहीं एक निगाह भर कर कभी
पता नहीं ये जिंदगीको क्यों ऐसे ही समेटते है
की बस जीने का आखरी दिन हो और कल सहर ना हो ??????
रोज देखती हूँ अनगिनत चेहरे
ख्वाहिश पलती है की एक चेहरा
बिना पहचानके भी एक बार मुस्कुराकर देख ले ....
पर नहीं महंगाईने तो उसे भी नहीं छोड़ा .....
फिर भी उम्मीद पर दुनिया कायम है ,
बिना किसी वजह एक दोस्ती का पल मिल जाए ....

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