13 सितंबर 2010

आजकी सुबह गुलज़ार साहब के नाम

पिछला हफ्ते के अंतिम दिन जिसे अंग्रेज लोग वीक एंड कहते है जबरदस्त गुजरा :
मेरी पसंदीदा फिल्म जिसे मैं तक़रीबन आठ बार देख चुकी हूँ दूर दर्शन पर दिखाई गयी और मैंने वो फिर एक नयी फिल्म की तरह देखी ....गीत का डायलोग : असल में तो वही हमें मिलता है जो हम सोचते है .....ये जो वक्त गुजर रहा है ना वो सबसे अच्छा है बाद में हम इसे याद करेंगे और खूब हसेंगे ......मैं अपने आप की फेवरिट हूँ ...ये सब छोटे छोटे डायलोग बहुत ही सरल है जिंदगी में उतारने के लिए कभी ट्राय जरूर करना ....
कल एक शक्ति सामंत की क्लासिक फिल्म देखी : अमर प्रेम : राजेश खन्ना ,शर्मीला टैगोर की बेहतरीन अदाकारी ,और प्यार का एक अलग ही मतलब जहाँ सिर्फ विशुध्ध प्यार ही था ....छोटी थी तब देखी थी मतलब आज पूरी तरह से समज में आया ....फिल्म के अंत में बेबाक आंसू उभर आये ...जिंदगी के कितने रूप !!!!!
और आज सुबह में मुलाकात देखी गुलज़ार साहब की दूर दर्शन पर ......एक बिजली के करंट की तरह उनके शब्द अल्फाज़ हमारे भीतर दौड़ जाते है :
उनके कुछ ख्याल :
==जंगल में चड्डी पहनकर एक फूल खिला ...
==हमारे अन्दरके एंटेना को हरदम खुला रखो ...जिंदगी हर पल उसपर ब्रश करके जाती है ...जितना ग्रहण कर सकते हो पालो उससे ...( शब्द कुछ अलग ही थे उनके अंदाज़ में पर मतलब ये ही था )
==खयालोका कोई वीजा नहीं होता सपनो की कोई सरहद नहीं होती ......हर रात सरहद के उस पार मेहदी हसनसे मिलकर आता हूँ ....
ये सब तो गुलज़ार साहब ही सोच सकते है ...बटवारे के वक्तमें उन्होंने जो सगी आँखों से दर्द देखा वो पच्चीस साल तक उन्हें नाईट मेर बनकर सताते रहे ...वो उस डरसे सोते नहीं थे की ये ख्वाब फिर से शुरू ना हो जाए ....
===कोलकाता में उनकी बिमल दा से मुलाकात जिसके कारण वो फिल्म में लिखने लगे जो वो चाहते ही नहीं थे ...उन्होंने कहा =तु अब मोटर मेकेनिक नहीं बन सकता दोबारा ....और हमें गुलज़ार मिले ....
===आठ नौ साल के गुलज़ार स्कुल से घर और रात में दुकान में सोने जाते थे और तब चिमनी की लौ में जासूसी कहानी की किताबे चार आने में हफ्ता भाड़े पर लाकर पढ़ते थे ...रोज नयी किताब नहीं देने के लिए फूट पाथ के फेरिये ने उन्हें एक दिन टागोर की किताब थमा दी जिस एक किताब जिसका उर्दू में तर्जुमा किया गया था गुलज़ार साहब की जिंदगी और पढने का ढंग बदल दिया और हमें गुलज़ार साहब मिले .....
==मिर्ज़ा ग़ालिब साहब से उनका रिश्ता ..कैसे उन्हें पढ़ा ,समजा ,सिखा ???उनके नाटको के अंश ...सब कुछ अति अद्भुत तरीकेसे वर्णित किया और हमने सुना ...
==
== सूरज बूझ जाए और कहींसे मेरी नज़्म उड़ती उड़ती उसमे जा गिरे और सूरज फिर से सुलग जाए ...कितनी आला दर्जे की कल्पना ....
दूरदर्शन पर आज उनके एक घंटे तक चले "आज सवेरे " के मुलाकात के लम्हों ने मुझे :

हमेशा उड़ती फिरती तितली को एक बुत बना दिया
मेरी आत्माको इस जिसमसे जुदा कर टीवी स्क्रीनमें लटका दिया ....

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