6 अगस्त 2010

उसे खो दिया ....

मेरी खुली खिड़की पर वो रोज आकर
खड़ी हो जाती थी बिना कुछ कहे ...
फिर एक आवाज लगाकर भाग जाती थी ......
जब पहले मुझे फुर्सत होती थी मुझे
ये हरकत भातीथी उसकी ....
अब तो मैं बड़ा आदमी हो गया हूँ ...
मुझे थोड़े वक्त में कितने सारे काम करने होते है ......
मैं कितने लोगोको खुश करने में लगा रहता हूँ ....
क्योंकि मैं सफल कहलाना चाहता हूँ .....
अब भी वो आती है , आवाज लगाती है ...
अब उसकी हरकत मुझे ना भाती है ....
उसे कुछ ना कहते हुए बस उसे टालना शुरू किया ......
एक दिन अचानक ....
उसने आना बंद कर दिया ....
ना आने का कोई बहाना भी ना किया ....
बस खुली खिड़की भी उसका इंतज़ार करने लगी मेरी तरह ....
पर वो ना आई .....वो ना आई ....
अब सोचा मैंने भी ...
क्या माँगा था उसने ??? कुछ नहीं ...
कभी कोई गिला नहीं कोई शिकवा नहीं बस दे जाती थी
एक प्यारी सी मुस्कान एक मीठी सी आवाज ....
आज दूसरों को खुश करते हुए मैंने उसे ही नाराज़ कर दिया ....
पूरी दुनिया को पाने की धुन में उसे ही खो दिया ...

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