4 अगस्त 2010

चाह ...

आज आसमांके आंसू की भाषा समजी
बेबस थे वह भी ,ना जाने वो संदेस
जो भेजा था किसी बावरीने पियाको अपने ,
बूंदोंके साथ कहीं फिसल गया .......
===============================
बस एक चाह बन गयी है
तुम्हे भूल जाऊं
सब कुछ भूल गया हूँ
बस तुम्हे भुला ना पाया ....

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

विशिष्ट पोस्ट

मैं यशोमी हूँ बस यशोमी ...!!!!!

आज एक ऐसी कहानी प्रस्तुत करने जा रही हूँ जो लिखना मेरे लिए अपने आपको ही चेलेंज बन गया था । चाह कर के भी मैं एक रोमांटिक कहानी लिख नहीं पाय...