22 अप्रैल 2010

एक ख्वाब था

एक ख्वाबगाह में सोयी थी एक राजकुमारी ,

एक सूरजकी हलकी किरणसे उसके गालों को सहला लिया था ,

वो चोरी चुपके से किया वो स्पर्श

मेरी जिंदगी का ख्वाब बनकर ठहरता रहा मेरे ख्वाबगाह में ......

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चंद पलोंके लिए तुम ठहर तो जाओ ,

मेरे दर पर तेरे पैरों के निशाँ है ,

सहेज के रख लेता हूँ अभी ...

क्या पता हवा ये निशाँ को कुछ हल्का ना कर दे

जब हम कल यहाँ फिर मिलने को आये ....

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