19 अप्रैल 2010

एक सुनहरा नूर थी वो

काली झुल्फोंकी घटा ये लागे जैसे सावनके बादल ,

तेरी झील सी आँखोंमें नीले आकाश को देखते है हम ...

परी हो या हो कोई अप्सरा ये तो हम नहीं जानते ,

जबसे देखते उन्हें हमको दिनमें भी चांदनीकी सफेदी नज़र आये है ...

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सिंदूरी शाम जाते जाते एक पयगाम दे गई ,

मेरी रातकी नींदे तुम्हारे नाम कर गयी ......

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