8 जनवरी 2010

पा ......

एक औरत जुडी रहती है हर इंसानके जीवनमें किसी भी रूप में ...

कल फिर एक फिल्म देखी ...पा ..अमिताभ बच्चन की प्रोजेरिया पर आधारित बहुचर्चित फिल्म ..फिल्म में अमिताभ थे तो एक चीज पर शायद ही किसीने गौर किया होगा ..एक किरदार उसमे और भी था ...विद्या बालन की मा का किरदार ...

औरत क्या है और उसका रुतबा क्या है और ये हासिल करने में एक औरत कितनी अहम् हो सकती है उसकी मैंने कहीं पर चर्चा नहीं पढ़ी या सुनी ...थोडा दुःख हुआ इस बात को लेकर ॥

विद्या बालन बिन ब्याही माँ बनने जा रही होती है ..जब पता चलता है उसके बॉय फ्रेंडको तो चिलाचालू संवाद भी सुनने मिले ..पर जब उसकी माँ के सामने वह रोती है तो माँ एक ही सवाल उसको चार बार पूछती है :

"क्या तुम इस बच्चे को जन्म देना चाहती हो ?" बेटी सब मुश्किलोंको बारी बारी कहती जाती है ,कहती है की इस बच्चेकी वह अकेले ही कैसे परवरिश कर पायेगी जब की उसकी तीन साल की पढ़ाई भी अधूरी है ...और वह सिर्फ येही सवाल दोहराती है ....

उसके बाद का जो उस माँ का जवाब है वह काबिले तारीफ था ....

" बेटी जब तु सिर्फ दो साल की थी तब तेरे पिताजी का देहांत हो गया था और मैंने तुझे अकेले ही पाला था और डॉक्टर भी बनाया ...और तेरे साथ तो मैं हूँ ...ये बच्चे को हम दोनों पालेंगे ..."

और एक औरत एक सशक्त सहारा बनकर बेटी के साथ खड़ी होती है और उसके सपने को पूरा भी कर देती है ...औरो उसे बम कहता था ...माँ से ज्यादा उसे नानी माँ समज सकती थी ...जब किसी औरत का देहांत छोटी उम्र में होता है तो आदमी किसी भी कारण बता कर दूसरी शादी कर ही लेता है चाहे वो बुढापेमें अकेलापन ही क्यों ना हो ...पर अब तक तो देखा गया है की औरतने हर मुसीबत झेल कर ना सिर्फ फिल्म में पर वास्तविक जीवन में अकेले ही जीवन बिताने की क्षमता रखी है ...अब जमाना बदल रहा है ...शादी के बाद रिश्तो को निभाना भी आधुनिक औरत की सहनशीलतासे परे होता जा रहा है ...आधुनिकता ने कई परिमाण बदले है ...तलाक कोई शर्मनाक घटना नहीं गिनी जाती ...लेकिन फिर भी अगर एक औरत औरत के साथ खड़ी हो तो आधी मुश्किलें तो वैसे ही हल हो सकती है ...

आज बलात्कार हो या और किसी समस्या से कोई औरत जूझ रही हो तब सबसे ज्यादा फिटकार उस पर औरत ही बरसाती है ...काश एक माँ खास करके भारतीय माँ , जो अपनी दूसरी बेटी के जनम पर मिठाई बाँटने की पहल कर पायेगी उस दिन सचमुच ये दुनिया का इतिहास बदलने की और ये पहला कदम होगा ...

फिल्म देखी अच्छी मूवी थी ..पुरे हाल में पुरे पचहत्तर लोग भी नहीं थे ...और उसमे लोगोने प्रोजेरिया से पीड़ित अमिताभ के किरदार को ज्यादा सराहा है ..अगर संवेदनशील फिल्म देखनी पसंद हो तो जरूर देखें ...ऐसी फिल्म जब देखते है तब लगता है :

दुनिया में कितना गम है ....

मेरा गम कितना कम है ...

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