10 नवंबर 2009

हमसफ़र

एक लंबे साएको हमसफ़र बनाकर

रात चल रही थी एक लम्बी सोयी सड़क पर

चुपके चुपके ताकि दिन भरसे थकी सड़ककी नींद ना टूटे ,

अपने क़दमोंकी आहट सोयी बिल्लीके पंजोमें छुपाकर ,

कुत्तोंके भोंकने पर परेशां सी ,

नींदमें जागकर एक छोटे बच्चेकी रोने की आवाज सुन

जगी माँके साथ जाकर पल भर बैठ बच्चेको फ़िर सुलाती ...

फ़िर चुपकेसे रात

पिछले पहर करवट बदलकर वक्त काटते बुढापेके तकिये पर

बैठकर उसके मनकी बात पढ़ लेती है ....

नव विवाहित जोड़ेके घर वो नहीं जाती

नई जिंदगीको दखल देने ...

पर प्रेमप्रवाहमें बह रहे वो प्रेमीके

जहनमें एक नज़्म बनकर लिख जाने की ख्वाहिश लिए ,

उसकी कलममें बैठकर कागज़ पर उतार जानेका इंतज़ार करती है ।

बस फ़िर सूरजके आनेकी आहट भरसे नंगे पैर भाग लेती है .....

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