14 नवंबर 2009

आयना बदलते ही ....

ये झूठी मुस्कानका नकाब पहने थक गए है हम ,

बस अब तो ये नकाब फाड़ देते है ,

असली चेहरा देखकर दुनिया उम्मीदें बांधना छोड़ देगी ,

ये ही सोचकर हलके महसूस हो जाते है .....

खुले चेहरेसे जब दुनिया को देखा

दंग रह जाना हमारा लाज़मी था ,

हर चेहरा सामने था वो शायद हमसे भी ज्यादा

इस दुनियाके गम झेल चुका था .....

फ़िर क्यों हमें ही गिले शिकवे थे जिंदगीसे ,

ये सवाल हमारा ही था और हम पर छोड़ गए थे .....

शायद ये होती है हमारे मनकी पैदा की हुई तकलीफें ,

बस आयना बदलते ही तस्वीर बदलने लगती है ....

2 टिप्‍पणियां:

  1. आईना बदलते ही तस्वीर बदलने लगती है , बस ये बहुत ही सुंदर बात कही है आपने |
    सचमुच अपनी जो शक्ल या अपने बारे में हम अपनी जो राय बना लेते है , वो ही हमारा दर्पण है |

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  2. खुले चेहरेसे जब दुनिया को देखा

    दंग रह जाना हमारा लाज़मी था ,

    संवेदनशील रचना। बधाई।

    उत्तर देंहटाएं

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