13 नवंबर 2009

बैर तुमने खूब लिया

ये हँसते लब कभी बता नहीं पाते तुम्हे ,

कितनी खरोंचे इस दिल की दीवारों पर है ,

लहू रिज़ रहा है ,

घाव नहीं भरने देती दुनिया ,

मरहम तो मुमकिन नहीं तुझसे हासिल ,

बस घाव देना रोक सके हो तो रोक लो .....

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ये भीड़में मुझे तनहा कर दिया ,

हँसी की चाहतमें आंसूके सागरमें डुबो दिया ,

अय जालिम इश्क करने क्या ऐसा गुनाह हमने कर दिया ?

हमें इंसानके नाम पर भी तुमने निकम्मा कर दिया .....

3 टिप्‍पणियां:

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    उत्तर देंहटाएं

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