10 अक्तूबर 2009

बदलते मौसम

सांवरीसी सूरत पर उलझकर अटक जाती है एक लट

उस एक तारी जालमें उलजकर कितने मौसम खुशगवार हो जाते है !!!!!!

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राहों पर पथरा रही नज़र ,

तुम्हारे दीदार पर ,

सुलगती तीली दियेकी तरह

अंगुली को चटखा गई ........

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दीवालीका ये तोहफा मुझे दे दो ,

वतन पर जांनिसार करनी है ,

मुस्कान ओढ़कर लबों पर ,

सरहद पर जाने की इजाजत दे दो .....

2 टिप्पणियाँ:

  1. उस एक तारी जालमें उलजकर कितने मौसम खुशगवार हो जाते है !!!!!!

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    waah ye mukhde par lat ki ada gazab dha gayi.

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  2. सरहद पर जाने की इजाजत दे दो .....
    बेहतरीन प्रवासी दर्द

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