22 अगस्त 2009

माफीनामा

आज तुझे भूल जानेकी चाहता हूँ इजाजत ,

इस रईसीमें हो जैसे गुरबतकी हिमायत ...

गुलदान सजा लूँ तेरी यादोंके गुलोंसे बस थोडी सी है जहेमत ,

अब तो सायेसे भी अपने हो गई है खिलाफत ....

इश्कमें कैसे तेरे हो सकू कैसे कुरबां ?अब ये चाहता नसीहत ....

कह दे मुझे अय मेरे खुदा कैसे करूँ तेरी इबादत ?

माफ़ कर देना मुझे क्योंकी अब इश्क बन गया है मेरी इबादत .......

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