28 जून 2009

ख़त के नाम एक ख़त ....

आज एक पुराने ट्रंक को खोला ...एक थोडी फटी पुरानी प्लास्टिक बैग निकला ...मेरी बिछड़ी हुई सहेली के दो तीन ख़त मिले .....उसे बहार निकला तो थोड़े फटे से थे ...कुछ अक्षर भी बिखरे थे ...पर ताज़ा थी कुछ यादें ...!!!

सबसे ज्यादा इंतज़ार का मजा आता था की कब पोस्ट मन आए और चिठ्ठी लाये ..!!!!चिठ्ठी न आने पर मायूसी का आलम और आ जाने पर उसे खोलकर डूब जाना ....

उसी समय में पहुँच कर उस पलोको याद किया तो मन भीग गया ...

आज हाथमें मोबाइल है ...मेमरी में नंबर भी होते है ...लव यु ..मिस यु ...कॉल यु बेक ...छोटे छोटे मेसेज से भरा होता है उसका इन बॉक्स ......बस एक नंबर डायल करो और चंद मिनट तक बात करलो... सच्चे जूठे अहेसास बाँट लो ....किसीकी भेजी हुई शायरी , विचार को फॉरवर्ड कर दो ....उसमे अपनापन ढूँढने की भी फुर्सत नहीं ...बस एक फ़र्ज़ की तरह प्यार को एस एम् एस से निभाया जाने लगा है .....आपने कभी कल्पना की है ?

१.....अच्छा ऐसे कहते वक्त सामने वाले इंसान के हाथ में रिमोट होता है और आप कोई दुःख की बात कह रहे हो और वो लेटेस्ट फ़िल्म का गाना बड़े चाव से देख रहा हो ...उसके मुख मंडल पर जो भावः उस वक्त होता है उसे आप देख लो तो शायद दोबारा फोन भी न करो .....पर एक ग़लतफहमी में जीना हमें रास आ रहा है .....

२....आपसे थोड़े फीट दूर होने वाला व्यक्ति बोल रहा है की अभी तो वह आउट ऑफ़ स्टेशन है ....

३...दुसर जरिए ईमेल ...वो तो आप सब जानते है ....छपे हुए अक्षर में टूटे फूटे मरोड़ की गुथ्थियाँ कहाँ ?

मुझे ये झूठ पर सबसे ज्यादा हँसी आती है ...की इंसान अपने आप को कितना स्मार्ट समजने लगा है और दूसरों को बेवकूफ ....सच कहूँ तो मुझे मिलने वाले व्यक्ति को मैं एक बिल्कुल साधारण व्यक्ति जिसे शायद बात भी करना न चाहे ऐसी लगती हूँ ...मैं उन्हें बेवकूफ दिखकर ही बेवकूफ बनाती हूँ .....दिल्लगी सिर्फ़ वो लोग ही नहीं हम भी तो कर सकते है .....

अगर आपने अपने लिखे या मिले खतों को संभाल कर रखे हो तो उसे फुर्सत में पढ़कर देखना ...सच वो आपके दिल को एक सुकून देंगे ...वह बातें जो लिखी होती है वह पढ़ते वक्त लगता है जैसे वो इंसान हमें ख़ुद ये बात अपनी आवाज में अपनी जुबानी बताता है ...जब चाहे उस ख़त को हम दोबारा पढ़ सकते है ...उसकी शायरी में वो कशिश हमेशा बनी रहती है बिल्कुल तरोताजा गुलाब की तरह ...एक नायाब खजाना होते है ये ख़त जिसकी हमें शायद ही इस ज़माने में कद्र होती है ...

एक ख़त लिखने बैठो ...देखो उन पलों में एक नई दुनिया ही होगी आपके साथ ...वर्तमान सारे टेंशन भूल कर अपनी बात आप लिख लोगे ....लिखने के बाद आप अपने आप को बिल्कुल हल्का महसूस करोगे ...मेरे पिताजी आज के भी दिन पर बधाई देनी हो तो कविता के रूप में लिख कर एक लिफाफा मुझे थमाते है ..ये उनका बेशकीमती तोहफा है ...

कुछ लब्ज़ इन खतों के नाम ;

बिखरी हुई खुशबुओं को सहेज कर बैठते हो ख़ुद में

जब मिलते हो तो बड़े अपने लगते हो

एक सच हुए सपने लगते हो

आप हमारे साथी फ़िर भी शब्दोंके कपडों में लिपटे लगते हो ....

तहे खोलकर ख़त की जब पढ़ते है

तो चेहरे पर खुशियों की लालिमा छाती है ...

कभी चेहरा शर्मसार होता है ...

कभी आँसू की शबनमसे धूल जाता है ...

कुछ होठोंसे न कह पाए कभी

ये भी अच्छा जरिया है तुम्हे ख़त से कुछ कहने का ...

तुमसे मिले बगैर रूबरू तुम्हारे वजूद को सहलाना है ...

तुम रहो ना रहो हमारी जिंदगी में ये तुम्हारे ख़त ही तो

जीने का हमारे आसरा है ........

=ये बात अभी जारी रहेगी अगले अंक तक .......

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी बातें पढ़कर अपनी ही एक पुराणी कविता की पंक्तियाँ याद आ गईं, 'चिट्ठियां लिखना तक भूल गए हाथ'... बधाई अच्छा लिखा, अच्छा लगा, शुभकामनाएं.

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  2. kamaal ki prastuti, aapki kalpnasheelta aur unko shabdon men baandhna , daad deni hogi, bahut khoob likha hai

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