18 जून 2009

ये पयगाम एक दोस्त के नाम ....

आज अचानक मेरे अजीज दोस्तने

एक अजीबसा सवाल पूछा मुझे !!

जान , हमारी दोस्तीका कैसा है मिजाज़ ?

कैसा है रंग ? और कितनी है गहराई ?

मैं उठकर बाहर आंगनमें गई

गमलेमें अधखिले लाल गुलाबको

तोड़कर उसके हाथोंमें रख दिया

देख ये है हमारी दोस्ती की तस्वीर ...!!!

वो हंस पड़ा ...

बस शाम होते ही मुरझा जाएगा ,

और फ़िर किसी पैर के नीचे कुचला जाएगा ...

फ़िर शायद ही याद आएगा .....

मैंने उठाकर उस गुलाबको

अपनी ग़ज़लकी डायरीके दो कोरे पन्नोंके बीच

संभालकर रख दिया

और बेशकीमती यादकी तरह टेबल पर सजा दिया .....

जुदा हो गए हम .......

बरसोंके बाद वो दोस्त एक बार

लौट कर फ़िर मुझे मिलने आया

मुझे गले लगाकर कुछ और कह न पाया ......

टेबल से उठाकर वह पुरानी डायरी मैं ले आई

कोरे पन्नोंके बीच सूखे गुलाबवाली डाली दिखाई ,

कोरे पन्ने महक रहे थे अभी भी ताज़ा ही थे ...

हमारी दोस्ती ,उसकी रंगत ,उसकी ताज़गी आज भी वही थी ......

3 टिप्‍पणियां:

  1. bahut hi umda rachna likhi........lajawaab.rishton ki mahak ko darshati.

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  2. फ़ूल मुरझा जाते हैं, खुशबू छोड जाते हैं । वह खुशबू कभी भी महसूस की जा सकती है । जो दिल और दिमाग में समाई रहती है ।

    बढिया अभिव्यक्ति ।

    उत्तर देंहटाएं

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