20 दिसंबर 2016

ये राज़ तो नहीं ????

डूबता हुआ सूरज सागर के ठीक पीछे जा रहा है  ,
न सागर सूखता है और न सूरज बुझता है  ...
दोनों की तासीर अलग ,दोनों की तस्वीर अलग ,
दोनों के मिज़ाज  अलग फिर भी
दोनों एक जगह मिलने के वादे पर अफर  ...
सागर हथेली खोले हुए सूरज को खुद में समाता है  ,
सूरज भी बुझने से बेख़ौफ़ उसकी हथेली में चला जाता है  ,
दूसरी सुबह दोनों ही अपने वजूद को फिर जिन्दा कर जाते है  ,
दोनों मिलो दूर से भी एक हो जाते है  .... पर
पर ये इंसान एक छत के नीचे भी मिलो दूर दिल से  ,
एक दूसरे के अस्तित्व को खत्म करने की घात  में  ,
एक दूसरे के वजूद को नकारता हुआ  ,
बस खुद के जीने के लिए औरों को मारता  हुआ  ....
इस लिए ही इंसान का अंत है
पर सूरज और दरिया अनंत है ये राज़ तो नहीं ????

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