15 दिसंबर 2016

गुजरती है .....

लब्ज़ टपकते है लहू की तरह  ,
कलमसे जब आग ज़रती है  ...
इतना छोटा सा दिमाग ,
उससे भी छोटा सा दिल ,
क्यों नहीं थकता उसके दायरों से ???
एक सादा सा कागज़
 एक सैलाब बनकर बहता है  ....
ये छोटी सी कलम तोड़े जाती है
ये छोटी सी कलम जोड़े जाती है  ...
कुछ बनते बिगड़ते रिश्ते
बनकर सैलाब कलम से कागज़ तक  ....
एक जन्म जो तय है  ,
एक मौत जो किसी मोड़ पर इंतज़ार में है  ,
उसके बीच के फासले तय करने का नाम
जिंदगी है  ,जो न कागज़ से  ,
न कलम से  , ना सांस से  ,ना नाम से  ,
बस वो तो सिर्फ तुम्हारे काम से  ,
उससे जुडी हर याद से  ,
होठो पर मुस्कान के साथ आँखमे अश्क़ लिए
गुजरती है  ...बस  ... गुजरती है  ..... 

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