14 दिसंबर 2016

दीदार

जहमत होती है पलकों को भी उठने के लिए  ,
वो तेरे चेहरे के सहारे संभलती है लड़खड़ाने से  ....
यूँ गुमाँ  मत करो अपने हुस्नका सरेआम  ,
घायल हुए दिलसे भी आह निकलती है  ....
हुस्न तो वो पाक नियामत है उपरवाले की  ,
उसके रहमोकरम पर उसकी इबादत करो  ....
तुम समजते रहे की हम तुमसे बेपनाह मोहब्बत करते है  ,
ये तुम्हारी खुशफहमी थी जिसे हम
ग़लतफ़हमी  करार दे न सके   ......
तुम्हारी आवाज में वो पाकीजगी थी
की हमें उपरवाले की तस्वीर दीखाई देती थी  ,
कैसे कहें हम इस आँख से कभी
इस दुनिया का भी दीदार न कर सके है  ...!!!!

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 15.12.16 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2557 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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