27 जनवरी 2016

हेलो ....... !!!

आसमानोंमें जम रही थी हवाएँ ,
बर्फ बनकर गिर रही थी रुई सी  ....
वो अंगीठी की तपिश से खुद को
गर्म करने की नाकाम कोशिशें
बदनमें सिरहन बनकर उमड़ रही थी  ....
आसमान चुप था  ,
जुगनू बैठ गए थे छुपकर  ,
रातका वो मध्धम संगीत भी सो रहा था  ,
चाँद खोज रहा था बादलों का दुशाला  ,
सितारों को ये ख़ामोशी अच्छी लग रही होगी शायद
इसी लिए वो सारे वैसे ही टीम टीमा रहे थे  ...
ऐसे में मेरे फोन का बजना
और धीरी आवाज से वो तुम्हारा कहना
हेलो  ....... !!!

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 28 - 01 - 2016 को चर्चा मंच पर चर्चा -2235 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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