7 नवंबर 2014

माँ का पल्लू

वो उभरती धुएं की लकीर उठती हुई
चाय के कुल्हड़ से गर्माती हथेली को  ,
ये  सर्द सुबहें होती है शॉल को लपेटे हुए ,
वो स्कूली बचपन याद आ जाता है  …
स्वेटर में बनी हुई माँ की  ममता की उन
गरमाहट बनकर लिपटी हुई उसकी गोद सी  ,
वो बेर ,जामफल को खाना नमक डालकर  ,
वो गुलाबी रंगकी बहती नाक और खो जाता रुमाल  ……
वो धुप सेंकती दादी उसके नाक पर का चश्मा  ,
वो बादाम का हलवा और गोंदकी बर्फी  ,
 रजाईको लपेटे घुस कर सोना बिस्तरमे ,
और बंध दरवाजे से उड़कर आती सपनेमे परियाँ  .......
बस यूँही  याद आ गया फिर जब मुन्नू को उठाने गए  ,
उसने दस मिनट कहकर फिर रजाइमे सर छुपा लिया ,
बेटे से बाप होने की ये यात्रा में पीछे छूटी याद का दामन ,
बस माँ का पल्लू  आँखों से बरस गया  …

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