11 अक्तूबर 2014

थिरकती है साँसे

थिरकती है साँसे बस एक आहट के आने पर ,
एक बूँद गिर गयी ओस की बस आँख से गालों पर ,
सिरहाने पर सपने सोये थे जागे से कुछ सोये से ,
उस आहट पर करवट बदली उन सपनोंने भी ,
यादों की चद्दर पर कुछ सिलवटें लिख गए  ....
सिलवटोंमें से सिमटे निकले वो गुजरे ज़माने ,
एक सफा कुछ पीला पीला कुछ कोरे कोरे अफ़साने ,
यादों की धूपमें कुछ नज़रको भी सुखा दिया ,
बिन ऐनक भी पीले सफों पर ताज़ा इश्क़ सहला दिया ,
कसम नहीं तोड़ी कभी आमना सामना न होने दिया ,
ये ज़ुर्म तुम्हें नहीं पता की तेरी यादोंमें बसाया जो शहर ,
उसके हर पौधेको खून से सींच कर हमने
उस शहर के गली कुंचो को हमने वीराना न होने दिया  … 

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