7 मई 2014

दिल की गवाही

दिलसे उठी टीस स्याही बनकर
कलमसे गुजर जाती है ,
वो सुफेद सफे के लिबास पर
नज़्म बनकर बीछ जाती है  …
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क्यों ऐसा होता है ?
एक नज़्मको दर्द की स्याही से लिपटना होता है ,
अंगारो पर चलता है दिल फफोले दिल पर लिए ,
बहते अश्कोंमे इश्क़ की इबादत नज़र आती है  …
कोई कहे ग़ज़ल या नज़्म हमें उससे ताल्लुक कहाँ ?
हमें तो उसमे रब से शिकायत नज़र आती है  ....
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इश्क़ में कोई जाना या अनजाना कहाँ होता है  ,
सिर्फ उसमे तो दिल की गवाही समज आती है  …
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सरेराह उसका चले जाना छोड़ हमें तनहा यूँ ,
गवारा न हुआ दिल को फिर भी  ,
हमें तो दो राहों से भले ये जिंदगी ,
मंज़िले तो एक ही नज़र आती है  …। 

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