31 जनवरी 2014

कोहरा

कुछ कहने की कोशिश का कोहरा ,
शब्द निशब्द ,ख़ामोशी का मोहरा ,
कलमकी छटपटाहट मेज पर ,
स्याही का भी विद्रोह कलमसे  ....
ख्यालोंकी  महेफिल सजती है अब ,
सिर्फ ख्यालोंसे उभरते है जहन जब ,
ये ख़ामोशी ये चुप्पी से है दोस्ताना ,
सामने हो कर भी अनजान से रहो ,
ये तेरे मेरे प्यार का वास्ता  …
कोई था कोई है कोई रहेगा ,
शायद ये कोई एक भी हो ,
या फिर ये कोई तीन रुपमे मिले ,
ये कोहरा जो तस्वीर को धुंधला कर उड़ चला  .... 

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (1-2-2014) "मधुमास" : चर्चा मंच : चर्चा अंक : 1510 पर होगी.
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है.
    सादर...!

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