18 नवंबर 2013

एक औरत


रोज रोज हर दिन टूट कर बिखेर देता है ,
हर सुबह फिर सिमट कर खड़ी होती हूँ  …
लेकिन भीतर ही भीतर दरारें बनती रहती है  ,
लगता है जुड़ती हूँ फिर टूटती रहती हूँ  …
जो कल तक साथ थे अब सामने आकर खड़े रहते है ,
कल तक सामना दुनिया का करना था
आज अपनों का करना है ,कुरुक्षेत्रका अर्जुन बन गयी हूँ ,
अपने वजूद के लिए ये संघर्ष है मेरा ,
मेरी जिंदगी पर मेरा भी कुछ हक़ है ,
मेरा भी कुछ अधिकार है सब के पास ,
मैं माँ ,बेटी बीवी के अलावा एक इंसान भी हूँ ,
हर तरकीब पता है ,हर कानून भी जानती हूँ ,
पर जिंदगी एक किताब या लड़ाई तो नहीं ,
हर दिन एक औरत एक माँ के आगे हार जाती है  ....
सबने आकर मेरे पास अपना अपना हिस्सा ले लिया ,
ये खाली कफ़न को लिए कंधे पर ,
सूखे पत्ते कि तरह उड़ती फिरती हूँ  …
पता नहीं कब तक  .... कहाँ तक ??????
मेरी मुस्कराहट के पीछे के सन्नाटे को सिर्फ मैं महसूस करती हूँ  ...

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