10 अगस्त 2013

क्यों ??? क्यों ??? क्यों ???

विस्तृत विश्वमें   संकुचित हो रही है सोचें .
कौन जिम्मेदार है?
जुड़ रहा है नया एक मोबाइल नंबर फोनबुकमें ,
टूट रहा है एक रिश्ता मन के कोनेमे अनजानेमें  ……
एक कमरा एक इंसान
दावा  कर रहा है दुनियासे जुड़े होने का क्यों ???
अकेला है घंटोंसे एक कमरेमें जहाँ के
बंद है खिड़कियाँ और दरवाजे भी   …….
एक दिन आता है ,
तनाव से मन भर जाता है ,
एक कन्धा जिस्मानी मिल जाय रोने को ,
चाहतें जगती है मनमे ,
वहां पर कोई चेट काम न आता है   …….
पर सब दूर है खुद से भी और औरों से भी   ….
खुद के खुद पर किये गए है
जो एहसान है ,दुनिया से कटनेकी खबर नहीं हुई ,
इस भरी हुई दुनिया में अब हर इंसान
बसता जा रहा है अपने अपने टापू पर  ……
जहाँ पर दुसरे टापू पर पहुँचने के लिए
न कोई कश्ती रही , न कोई साहिल  …
बस चारो तरफ बढती भीड़ में
एक तन्हाईयाँ बाकी रही है मेरे दामन में  …….
क्यों ??? क्यों ??? क्यों ???

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (11-08-2013) के चर्चा मंच 1334 पर लिंक की गई है कृपया पधारें. सूचनार्थ

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  2. दुनिया जितनी सिमटती जा रही है ...मन उतने ही अकेले होते जा रहे हैं....

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