20 जुलाई 2013

दाग दामन पर...


दाग दामन पर लगा था ,

कुछ चिंगारी सा उस पर पड़ा था ,

एक काला सा छेद बन पड़ा था ,

घूँघट निकाले तो आंखों के सामने आया था ...

काली सी लकीर थी वहां पर मेरी आंखों का काजल जैसे ,

एक संधान था दुनिया के साथ घूँघटमें से ,

बस वहीं से तोसे नैना लागे

दिल में कसक उठी

जैसे शिशिरमें कोयलकी कूक उठी ,

पर हाय जबान खामोश ही रह गई ........

एक जोर का हवा का झोंका दुपट्टे को उड़ा ले गया ,

बेनकाब हम आपके सामने खडे थे नज़र झुकाए ,

ये आपकी खता थी जिसे आपने प्यार का इजहार समज लिया ,

बस खता हवाओं की थी और दिल सज़ा पा गया .....

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति की चर्चा कल सोमवार [22.07.2013]
    चर्चामंच 1314 पर
    कृपया पधार कर अनुग्रहित करें
    सादर
    सरिता भाटिया

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति .. आपकी इस रचना के लिंक की प्रविष्टी सोमवार (22.07.2013) को ब्लॉग प्रसारण पर की जाएगी. कृपया पधारें .

    उत्तर देंहटाएं

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