19 जुलाई 2013

संगेमरमर का टुकड़ा है


संगेमरमर का टुकड़ा है ,

जमीं पर नर्मो नाजुक सा आता है ,

वो पत्थर नहीं मोमके सान्चोमें तराशा जाता है ,

दोस्त ! गौरसे देखो ये हमारी जिंदगी कहा जाता है ....

हम तराशते है हमारी जिंदगीको ,

कोई मूरत होती है खुबसूरत सी ,

कोई रंगोंके बिखरे ढेर सी ,

कोई खिले गुलाबसी महक जाती है ,

कोई सारी कायनात को रुलाती है ,

कोई खुली गटरसी बदबूदार बन जाती है ,

कोई आधी अधूरी तराशी हुई प्रतिमा ही रह जाती है ,

छिनी हथोडी भी मिलती है हर किसीके पास ,

समज नहीं आया आज तक

क्यों ये दुनिया हर हर्फ़ पर किस्मतको कोसे जाती है ????

तस्वीर बनाते है अपनी अपने जहनमें

उसे तराशकर रख देते है ....

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