24 जुलाई 2013

कभी निगाहें करम बोलती है ........


कभी फुर्सतमें मिलते हो ,कभी फुर्कतमें मिलते हो ,

कभी भरे बाज़ारमें दिखते हो ,कभी ख्वाबोंमें मिलते हो ,

कभी लब्ज़ तक नहीं कह पाते ,कभी निगाहें करम बोलती है ,

ये जिंदगी आपकी अमानत है ये कहानी बेजुबां बन कहती है .....

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इनकार नहीं किया कभी ,इंतज़ार नहीं किया कभी ,

इकरार नहीं किया कभी फ़िर भी हमने ऐतबार किया आप पर ....

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एक कोरे कागज़ पर उभरी तसवीर थी तुम ,

एक ख्वाब रातमें देखा था शिद्दतसे कभी उसकी ताबीर थी तुम ,

एक अंजाम जो खुशफहमी बना उसका आगाज़ थी तुम ,

एक सच जो सिर्फ़ ख्वाबमें ही अच्छा था आज हमारी बीवी हो तुम ..........

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1 टिप्पणी:

  1. इनकार नहीं किया कभी ,इंतज़ार नहीं किया कभी ,
    इकरार नहीं किया कभी फ़िर भी हमने ऐतबार किया आप पर ...

    बहुत उम्दा शेर ... सभी लाजवाब ...

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