14 जुलाई 2013

रोज चलती है

रोज चलती है एक जिंदगी मेरे साथ हर पहर ,
बस परछाई सी कुछ लगती है ,
श्वेत श्याम मेरे दायें बाएं सूरजसे डरती हुई ,
मैं रुकती तो वो रूकती , मेरे चलने पर फिर चलती ....
उसके श्वेत श्याम रंग में मुझे हर रंग नज़र आये ,
मेरे सपने उसकी आँखों में मुस्कुराये ,
मेरे दर्द उसके दिलने बांटे ,
उस दर्दने उसकी आंखोंमे नश्तर चुभोये ,
मेरे गम उसके अश्क बन बिखर जाए ,
मेरे सपने टूटते ,संवरते देखे उसमे ,
मेरे ख्वाबो को  खंडहर उसने न बनाये ,
बहुत बड़ा तहखाना ही उसके पास ,
उसे संभालकर रखे है उसने एक सन्दुकमें ...
उसने अपने साथ होने का एहसास भी नहीं दिया कभी ,
बस तन्हाईमें बैठे है कभी एक सड़क के किनारे ,
मेरे साथ वो हरदम बैठे नज़र आये ....
और मैं सब कुछ भुलाकर ,
बस वही रुखी सी बेजान सी जिन्दगीको ,
सच समजकर ढोती  रही हूँ हरदम ....
क्यों खुद से  संघर्ष कर रही हरदम .....

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