4 जुलाई 2013

लुकाछिपी

बस खरोंचती हुई फिसलती है
ये बुँदे मेरी खिड़कीके शीशे को बाहर  से ,
बस यूँही सताने बरसातकी लड़ीसे
बिखरते कोई मोती सी ,
शीशे के अन्दरसे छूती हूँ ,
गीली बूंदों की लकीरोंमें भी
फिर कोरी सी रह जाती हूँ ...
और फिर थोडा सा शीशा खोलते है
तो हवा के पंख पहनकर
जबरन मुझे छू जाती है ,
बस ये कुछ यूँ तो नहीं ??!!
जो पहले प्यार का नशा होता है !!!
दीदार को तरसती है नज़र यहाँ वहां
और सामना होते ही हया की चिलमन के पीछे
एक लुकाछिपी का मज़ा होता है ???


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