18 मई 2013

तेरी सदा आज भी है .....

आज भी मेरे कम्प्यूटरमें जगह खाली ही खाली रहती है ,
क्यों की आज भी मुझे कलम कागज़की आदत सी है ...
अभी भी मिलते है कागज़ के टुकड़े मेरे कमरे की फर्श पर ,
कल रात अधूरी लिखकर फाड़ी थी जो नज़्म बिखरी पड़ी है ....
बस अहेसासों को नए नए चोले  पहनाने का शौक है शायद ,
लिखकर फाड़ देने के खेलमे मुझमे बचपन जिन्दा आज भी है ,
अधूरी अधूरी सी मूरतें बंद है दिल के बंद कमरे में मेरे आज भी ,
 उनमे से उभर कर आती है पूरी तस्वीरे जहनमें कैद आज भी है ....
कहते है हर पलकों जीते है हम मर मर के तेरी यादोंमे ,
फिर भी दिलकी हर धड़कनमें जिन्दा वो तेरी सदा आज भी है .....

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (19-05-2013) के चर्चा मंच 1249 पर लिंक की गई है कृपया पधारें. सूचनार्थ

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