15 मई 2013

एक खुशफहमी में रहती थी रात

एक खुशफहमी में रहती थी रात
कहती थी मेरे पास चाँद है ,
चाँद जिसे गर्मीकी कटारीसे काटता था ,
सूरज एक एक दिन झुलसा हुआ बन कर ...
 उसके छोटे छोटे टुकड़े बनकर बिखेरकर हँसता था ...
हम उसे तारे सितारे कहकर गिनते थे ,
ये गिनती अधूरी सी ,भूल भुलैयासी बस ...
फिर कभी सूरजको  पछतावा होता ,
वो टुकडे टुकड़े जोड़ने बैठता ,
फिर एक बार पूरा चाँद मुस्कुराता ,
और फिर सूरज झूमता खुश हो होकर ,
और ज्वालायें उसके तन बदनकी ,
फिर लौ बनकर चाँदको पिघलकर रख देती ...
वो ही चाँद के टुकड़े सितारे बनकर चमकते है ,
और फिर वो सूरज सितारे  बटोरकर
एक और चाँद बनाता है ......
ये रात ये चाँद ये सूरज और ये सितारे
बस हर दिन रात उनके खेल को देखती हुई ,
उनके खेल को तकती हुई ,उनके दर्दमें बिलखती हुई ,
उनके आंसू से भीगती हुई ,उनकी खुशी में खिलखिलाती हुई ,
ये धरती उसके आसमानसे मिलन की आस में बैठी है ....
उसे पता है कितने तारे है आसमानमे ???
क्योंकि वो हर रात एक तारा जोडती है गिनतीमें ,
उसकी और आसमान की जुदाई का ....!!!!!!

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