17 मार्च 2013

नज़रों को साफ़ कर ले ....

ये मुस्कराहट तो अश्क को छुपाने की अदा है ,
बस पलकें उस बूंदसे भारी हो जाती है ...
ये आँखों का क्या करे ???
कोई कहता है ये आयना है खुद के भीतर का ,
कोई उसमे अपनी तस्वीर ढूंढ लेता है ,
कोई उसमे चंचलता खोज लेता है ,
कोई ख़ुशीका नृत्य देखता है ,
पर बस कोई उसमे मुझे नहीं ढूंढ पता है ......
क्योंकि ...
क्योंकि हर कोई वही ढूंढता है
जो वो ढूंढना चाहता है मुझमे ,
बस वो बूंद नहीं नज़र आता है ,
बस होठो पर मुस्कराहट धोखा देती रही है अक्सर ....
और ...
और कहीं से सदा आई दूर से
बस ये बूंद बहा दे आँखों से ,
नज़रों को साफ़ कर ले ....
कुछ धुंधली हो गयी है नज़र तेरी भी ,
बस दुनिया को देख लो फिर जैसी भी ये है .....

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