9 अक्तूबर 2012

वो एक औरत थी .......

एक सूर्ख जोड़ेमें एक घूँघटमें
लिपटा एक चेहरा है ....
हाथके कंगनकी खनखनाहटमें
दबी हुई वो सिसकियाँकी खुसफुसाहट !!!
पसीनेसे तर चेहरेसे बुँदे साथ ले जा रही है ,
अंसुवनकी एक धार भी ....
आगे शहनाई बजाते हुए जा रहे थे कुछ लोग ....
समजे ये तो शामियाना होगा शादी का एक नज़ारा !!!!
पर अचानक गिर पड़ी वो मूरत
जिसकी अनदेखी थी सूरत ....
वो सुर्ख जोड़ा तो लदा  हुआ था लहूकी धाराओंसे ...
हर ज़ख्म एक अलग दास्ताँ लिए बह रहा था खरोंचोसे ....
पीठके पीछे लगे थे धोंखोके अनगिनत खंजर ....
लड़खडा रहे थे कदम और खुद की लाश ढोए हुए
चल रही थी जो कदम दर कदम ....
वो एक औरत थी .......
घूँघट सरक गया तो होठों पर मुस्कान ही थी !!!
किस पर हंसी होगी वह !!!!
अनगिनत नाम दिखे हर ज़ख्म पर
पढ़ नहीं पाए !!!
आँखें नम थी ....एक अश्क बह गया था धोखा देकर ....!!!!

1 टिप्पणी:

  1. सार्थक रचना है मन के मनोभावों को मजबूती से प्रस्तुत किया है आपने .बधाई|

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