15 अक्तूबर 2012

वो हमनवा मेरा

हर सुबह एक नया इंतज़ार लेकर आती है ,
हर शाम उसमे एक रंग भर जाती है .....
बस एक रात ही तो है मेरी सखी सहेली ,
तेरी यादों को मेरे सिरहाने पर सहेलाती है .....
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कभी कभी अजनबी लगती है ,
कभी कभी अपनी लगती है ,
है अपना ही अक्स फिर भी ,
ये जिंदगी क्यों अधूरी ही लगती है ....???
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हमसाया था वो हमनवा मेरा ,
दिल टुटा फिर भी वो बिखरा नहीं ...!!!
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सरहदोंसे पार एक पैगाम भेजा है ,
वो जो याद कर रहे है बड़ी शिद्दतसे
उन्हें हमने यादोंका गुलज़ार भेजा है ,
आ जाओ इंतजार हमें ये पैगाम भेजा है .......

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