2 अक्तूबर 2012

चाँदके चंद टुकड़े ...

चाँदके चंद टुकड़े
थोड़े टुकड़े थे कांचकी चूड़ीके
टूटी पाजेबके थोड़े घुंघरू
एक टूटी गुडियाके जूते  मोज़े फटे हुएसे
ये सारे साजो सामान निकले मेरी संदूकसे
मुझे ढूंढते थे
चेहरेकी झुर्रियोंमें
रुपहली बालोंकी लटोसे बने झुड़ेमें .....
बस मेरे खुरदरे स्पर्शमें
शायद उन्हें सुकून मिला होगा
वो ही बचपनी मासूमियतका ....

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