9 अगस्त 2012

कृष्ण तेरी बांसुरी




कृष्ण तेरी बांसुरी जो लगी सदैव होठों पर ,
खुदको खोखला करके उसमे तेरी फूंकोके स्वर भरने पर ,
तू हमें अपनाये ये कह जाती है ये बांसुरी ....
खुद को छेदसे छलनी करके राग सुनाती ये ....
कृष्ण तेरा मोरपिच्छ तेरा मुकुट बना है ,
जिंदगीको रंगोंसे भरो सदैव सिखा जाता है ये ,
गौ तेरी कहती है जीवनके हर पल को खुदको ,
न्यौछावर कर दो सब के लिए .....
तेरा वो मक्खन चुराना और ग्वालोंको खिलाना ,
सिखाता है की जियो सबके लिए ,बांटकर हर सुख नवनीत .....
वो गोपियोंका मटकी फोड़ना ये कह जाता ,
जुर्मके आगे न जुकाओ सर पेट राजा कंसका भर ..........
रास लीला तेरी कह जाती हर गोपीकी भक्ति छूती है तुझे कान्ह,
जिसके लिए धरता जाए एक से अनेक परमाण....
तू राधा का भी है तू मीरा का भी है ,
एक के संग मुरली बजाता ,दूजी के विष को हर जाता ..
सखा बनकर चलता अर्जुन संग रथ सारथि बन जाता ,
तेरे शस्त्र त्याग पर भी पांडव महाभारत जीत जाता ........
तेरे शरण तेरे नाम में तेरी धूनमें रम जाएँ ,
तेरी शरणमें आकर हम भी भवसागर तर जाए ....

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