17 अगस्त 2012

कोई इबादतका रूप है ???

कितना कुछ लिखा ये कागज़ पर पर नज़र आता है ये कोरा,
लिखते लिखते ये ध्यान न रहा की स्याही ख़त्म हो चुकी थी ......
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टूट टूट कर बिखर रहे है इस एहसासोंके तुकडे दिलके फर्श पर ,
फिर भी ये धड़कन सुनाई देती है कहाँसे ये मालूम न हो सका ??!!
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पैरोंके तले कुचल रही धरतीने न कभी की शिकायत की ,
मेरे जर्रे जर्रेको घायल कर रहे है ये कदम तुम्हारे आगे बढ़ते ...
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जहाँ जहाँ नज़र ठहरी तेरा है नज़ारा था हर तरफ ,
तेरे अपनोंमें बस मेरा ही नाम शुमार न था ,
फिर भी खिड़की के पार तेरी नज़रे टिकी थी
मेरे दरकी किवाड़ों पर कहीं मेरे दीदार के लिए ....
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ये खुमार है इश्क का ये कोई इबादतका रूप है ???
बस झुकी हुई नज़रोंसे इंसान नज़रमें उठ जाता है किसीकी ..!!!

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