23 जुलाई 2012

उसका क्या करू ?

चलो आज कुछ कसमे तोड़ते है ,
चलो कुछ रस्मे तोड़ते है ,
ये वादोंको भी तोड़ेंगे अभी ,
चलो कुछ उसूलोको  भी तोड़ देते है ....
ये सब वो रस्मे है ,कसमे है ,उसूल है ,वादे है ,
जो एक कंजर जंग लगी बेडीसे है ,
जो आगे की राह पर चलने नहीं देते ,
जो पीछे मुड़ने भी नहीं देते ,
बस गाढ़ कर रख दिया है हमें जमीं पर ,
बहते अश्कोको ये रुकने नहीं देते ....
जो कसमकी रसम सिर्फ मुझे ही निभानी हो
उसका क्या करू ?
जो रसम सिर्फ मुझे ही निभानी हो
उसका क्या करू ?
जो उसूल सिर्फ मुझे तोड़ते हो ?
उन उसूलो का क्या करू ???
जो वादे  सिर्फ मुझे ही निभाने हो
उसे क्या करू ???
पैर हाथोंकी बेड़ियाँ तोडनी बहुत आसान  है ,
जो दिल पर पहरा देती रहती है हरदम
उस कैदमें जीकर क्या करू ????
जब की मैं जानती हूँ ...
मैं कहीं नहीं ,मेरे निशान कहीं नहीं शेष तेरी जिन्दगीमे ,
तेरे बगैर काटने पर मजबूर हो जाऊं उस जिंदगी का क्या करू ??????

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