17 फ़रवरी 2012

बस दो किनारोंके बीच...

कभी कोई अजनबी अचानक मिल जाते है रस्ते पर ,
आँखोंसे होकर दिलमें घर बनाकर बैठ जाते है ,
हम पर हमारा ही बस नहीं नहीं रहता क्यों ?
बस उसकी गैरमौजुदगीके आलममें
जिंदगी एक कोनेमें सहमकर सिमटकर बैठ जाती है ................
वैसे तो रोज रोज हम साथ चलते है ,
नदीके दो किनारोंकी तरह ,
महसूस करते है एक दुसरेकी मौजूदगी दुसरे किनारेसे ...
पर जब कहा उसने मैं नहीं हूँ दो दिन ...
शायद मेरा वक्त वहीँ रुका है ,
आगे चलने के लिए तैयार ही नहीं ....
शायद वो भी उसका आलम होगा
जब उसे छोड़ मैं अकेली चली गयी थी दूर कहीं !!!
अब इंतज़ार उसके लौटने का ....
उसे फोन भी कैसे करे ???
दोनों किनारोंके बीच नेटवर्क नहीं मिलते कभी ...
बस दो किनारोंके बीच बहती है जीवन धारा.....

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