22 जनवरी 2012

एहसान बस इतना सा कर दो

एहसान बस इतना सा कर दो ,
आज फिर एक बार मुझे खुदके हवाले कर दो ....
मुझे घुटन हो रही है ,
इन जूठे रिश्तोके लिबासोमें ,
मुझे एक अनजान डगर पर जाने की मोहलत दे दो ....
कहोगे की किसने रोका है मुझे ???
बस एक वादे ने जो किया था मैंने कभी 
की कभी साथ न छोड़ेंगे तुम्हारा ....
पर आज तेरे दर पर आकर देहलीजसे हम लौट गए ,
बहुत भीड़ है तुम्हारी ख़ुशीमें 
तुम्हारे साथ    कहकहे लगाने वालो की ,
यहाँ की तन्हाई से तो वो तन्हाई भली है ,
जो राह तकते मेरे घरकी खिड़की से 
सारे लम्हे गुजरते थे तेरी यादों के .....

1 टिप्पणी:

विशिष्ट पोस्ट

मैं यशोमी हूँ बस यशोमी ...!!!!!

आज एक ऐसी कहानी प्रस्तुत करने जा रही हूँ जो लिखना मेरे लिए अपने आपको ही चेलेंज बन गया था । चाह कर के भी मैं एक रोमांटिक कहानी लिख नहीं पाय...