15 अक्तूबर 2011

सूखेसे पत्ते उड़ते

 सूखेसे पत्ते उड़ते हुए मेरी खिड़कीसे 
मुझे पूछ बैठा क्या मैं अन्दर आ जाऊं ???
मैंने पूछा उसे क्यों आना चाहते हो ...
इतना बड़ा आसमाँ खड़ा है तुझे आगोशमें लेने !!!
उसने कहा पनाहकी चाहत है मुझे ...
यूँ उड़ना हवाओके साथ ये मेरी ख्वाहिश तो नहीं ...
ये मेरी बेबसी है मैं साथ हूँ उनके वो ...
पर तेरी पनाहमें थोड़े सुकूनकी आरजू कोई गुनाह तो नहीं ??!!
में मंजिल हो न हो वो मुझे लेकर चलते है मुफलिस समजकर ,
क्या हुआ बिछड़ गया फिजामें पेड़से ,
पत्तेकी शख्शियतको भुला दू ऐसा बेवफा तो नहीं ,,
प्यार की सुगन्ध है उस दरख़्त की 
 और मिटटी की खुशबू अभी भी मेरे भीतर....
बिछड़कर उससे गुमशुदा हो जाऊं ये रंजिश तो नहीं !!! 

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