18 सितंबर 2011

सपने भी पाँवमें पायल पहनकर आते है ,

आजकल सपने भी पाँवमें पायल पहनकर आते है ,
जब लिपटकर हम सोते है नींदकी चादरसे ...
अपनी खनकसे जगाकर चले जाते है हरदम ...
नाचती हुई पलकोंसे वो ताल मिलाते है ,
हमारे सोये हुए कुछ अरमानोको जगाकर चले जाते है .....
कहते है सयाने कभी सपनोंको मरने नहीं देना ,
सपने ही सच होने को देखते है एक सुनहरे दिन का रास्ता .......
तब मैंने आज रात कहा मेरे सपने को 
थोड़ी सी ख़ामोशी भी दे दिया करो मुझे तन्हाईमें जीने दो ....
बड़ी मुद्दत के बाद आज जमीं परसे चाँद नज़र आया है ,
चंद लम्हे उनसे भी तो गुफ्तगू करने दो .......
चाँद बहुत बुरा मानता है जब उससे कुछ बात नहीं करती ,
भाग जाता है मुझसे दूर कहीं 
अमावस बनकर खिजाते हुए ....
आज चाँद रात भी है ...
बादलोंसे निकला हुआ चाँद भी है ...
तुमने तोड़ी है नींदे मेरी पायलकी झंकारसे ...
हरजाना देना पड़ेगा मुझे इस बात के लिए 
आज रात सिर्फ चाँद के नाम होगी ....

3 टिप्‍पणियां:

  1. किस खूबसूरती से लिखा है आपने। मुँह से वाह निकल गया पढते ही।

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  2. बहुत सुन्दर शब्द चुने आपने कविताओं के लिए..

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  3. पहले चुपके से और अब पायल पहन कर आना गजब ढा गया

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