21 नवंबर 2010

आओ तुम्हे चाँद पर ले जाए

आज सुबह ठिठुर रही थी ,
हलकीसी काँप भी रही थी ,
सूरज भी देखो बादलकी शालमें चेहरा छुपा रहा है ,
ये सुखी हुई लकड़ी जो जलकर हमें गर्म कर रही है ,
देखो ये भाप निकलती चायकी प्याली
हमारी ठण्डको थोडा कम करने की कोशिशमें जुटी हुई है ....
देखो ये फटे स्वेटरमें ठन्डे पानीमें बर्तन धोने महरी भी आ गयी है ....
देखो सिगरेटमें धुएंमें कोई नाहक ठण्डसे झूझ रहा है ....
एक कम्बल ,एक खाट, एक नींद ,एक आँख और उसमे मूंद कर देखो
एक प्यारी सी परी बादलों के पार ,
सफ़ेद कपडे में ,माथे सितारों का ताज पहनकर आती है ,
सफ़ेद बादलों के पार हमें साथ लेकर उड़ जाती है ,
चाँद पर हमारी सवारी रूकती है ,
वहां पड़ी दूध की नदी से चुल्लू में दूध पी लेते है ,
थोड़ी बादाम पेड़ से तोड़ लेते है ....
फिर बर्फ के पहाड़ो पर फिसलते है ,
और चोट लगते ही आँख खुल जाती है ,
हम तो बिस्तरसे गिर पड़े है ....

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