20 नवंबर 2010

वो शाम ...

कुछ कहे अनकहे अल्फाजोंमे सिमट कर बीती
एक एहसाससे भरी शाम थी
कोई जैसे पयाम थी ,
कुछ कहीं कुछ कह रही थी ,
मैंने सुना नहीं
बीचमें कांच की दीवारें थी .......
बस देखते देखते अँधेरा होता गया घना ,
फिर भी तुम्हारे चेहरे को देखा जैसे चाँद खुले आसमां का हो ....

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