21 मई 2010

शबनम ...

शबनम सरकती नज़र आ रही थी ,

सुबहकी कोमल किरन भी आपको झुलसा रही थी यूँ ,,,,,

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तुम्हे पा लेने की तड़प भी अब नहीं रही ,

कहते है जनाजे पर इंसानकी रूह होती है

जब चाहे जहाँ चाहे जिसे चाहे

वहां पर वो जाने तमन्नाका दीदार कर सकती है .....

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर कविता.... दिल को छू गई.... बहुत खूबसूरती से शब्दों को पिरोया है आपने.....

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