11 मार्च 2010

कुछ तो है ...

रुकती चलती बहती हवाओंके थपेड़े

कभी सहलाते ,कभी जैसे एक थपेड़े मारते ,

मेरी तनहाईके संगी साथी है ....

एक सुर बनकर मेरे कानोंमें घुलकर

पियु का संदेसा लाते है ....

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इंतज़ार करनेकी हमें तो आदत नहीं थी ,

ये कम्बखत इश्कने हमें ये भी सिखा दिया ........

नींदोंको ओज़ल करके आंखोसे

ख्वाबोंके संग जीना सिखा दिया .....

2 टिप्‍पणियां:

  1. इंतज़ार करनेकी हमें तो आदत नहीं थी ,ये कम्बखत इश्कने हमें ये भी सिखा दिया ........नींदोंको ओज़ल करके आंखोसे ख्वाबोंके संग जीना सिखा दिया .....

    waah ........bahut hi sundar likha hai........dil ko chho gayi panktiyan.

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  2. "इंतज़ार करनेकी हमें तो आदत नहीं थी ,

    ये कम्बखत इश्कने हमें ये भी सिखा दिया ........

    नींदोंको ओज़ल करके आंखोसे

    ख्वाबोंके संग जीना सिखा दिया ....."

    बहुत सुन्दर रचनायें ।

    उत्तर देंहटाएं

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