10 मार्च 2010

फिर तेरी तलब ....

घुट घुट कर यू हम जीते हैं
अश्कों को अपने पीते है
तलब तेरी दिल में लिये
क्या जाने कब तुझे रहम आ जाये
हमें जीने की वजह मिल जाये !!!!
======================================
किरकिरीसी हाथोंकी लकीरोंको तकते हुए
नज़रसे भर दी हमने उन खाली सतह्को
मेरी तक़दीरको जो मुकम्मल अंजाम दे गया ,
खो गया वो शख्स फिर किस गुबारमें ???
=======================================
मुखातिब हुए है तेरी महफ़िलमें फिर आज ....
तेरे रूहानी नूरसे रोशन कर दे जहाँ मेरा फिर आज ....

2 टिप्‍पणियां:

विशिष्ट पोस्ट

मैं यशोमी हूँ बस यशोमी ...!!!!!

आज एक ऐसी कहानी प्रस्तुत करने जा रही हूँ जो लिखना मेरे लिए अपने आपको ही चेलेंज बन गया था । चाह कर के भी मैं एक रोमांटिक कहानी लिख नहीं पाय...