19 फ़रवरी 2010

तनहाई कुछ बोल गयी ...

कसमोकी रस्मोको नहीं समजा हमने ,

हमने तो प्यारकी सच्चाई पर यकीं किया सदा .......

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बहते जलकी धारा

हथेलीको भीगो जाती है ,

ना रहता हो निशाँ साहिल पर मौजोंका

फिर भी किनारेकी भीगी रेत

तेरे आनेकी दास्ताँ बयां कर जाती है ....

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जाकर आज हाथ थाम लेते है उनका

बहुत अकेले हो गए है दिल टूट जाने के बाद ,

उनके आंसू को दामनसे अपने सुखा देंगे ,

क्योंकि हम तो कायल रहे उनकी मुस्कानके सदा से ...

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