30 मई 2009

पुराने फ़िर भी हमेशा नए से ......

प्यार और शादी में क्या फर्क है ?
प्यार लम्बी नींद है और शादी अलार्म …॥

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लड़की का हाथ क्यों मांगते है ? पैर क्यूँ नहीं ?
हाथ में चूड़ी कंगन अंगूठी होते है और पैरमें सेंडल !!!!!…॥

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शादी यानी की शराब की बोतल में नारियल पानी ….....

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लड़की कहती है मैं आपका सात जनम तक साथ मांगती हूँ …
डेंजर बात है ये तो :
वो आंठ्वे जनम में किसी और के बारे में सोच रही है अभी से ……

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एक आदमी अपने मैरिज़ सर्टिफिकेट को गौर से देख रहा था ..
पत्नी ने पूछा आप इसको इतने ध्यान से क्यूँ देख रहे हो ?
पति : मैं इसमे एक्सपायरी डेट ढूंढ रहा हूँ .....

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शादी और रेल के पहिये में क्या समानता है ?
दोनों में बैलेंस रखना जरूरी है वरना दुर्घटना हो जाती है …।

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दो दोस्त बातें कर रहे है :
एक : शादी से पहले मेरी बीवी रोज एस एम् एस करती थी –आय लव यू डियर …।
दूसरा : अब बंद कर दिया ??…
एक : नहीं अभी करती है शादी के बाद भी …एक किलो आलू ,एक किलो टमाटर , एक किलो भिन्डी ……
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29 मई 2009

आरजू एक शमा की .....

जिनकी तमन्ना को कुछ जवां होने दो ,

तक़दीरकी लकीर को हम पर मेहरबां होने दो ,

कलमें जगी थी उम्मीद थोडी रोशन सी थी ,

बस उसे अब प्यार की दास्ताँ होने दो .....

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जुस्तजू किए थे हम कि खाक हो जाए हम भी परवानो की तरह ,

खाक हो जाने की उस शमा की तक़दीर न थी बुझ गई वो मझधारमें ,

जमें हुए उस शमाके अश्क पर कुछ देर तो हम भी रुक लिए ,

तक़दीरसे लड़ लिए की क्यों हमारी किस्मतमें फ़ना होना न था .........

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28 मई 2009

इंतज़ार ...

छूकर गुजर रही है ये सर्द हवाएं अब हमारी गलीसे यूँ ,

जैसे सहरामें फ़िर भीगी बारिशके बादल छाये हो ...........

फ़िर मनने गीले से सिले से सपनेको संजो लिया ,

फ़िर किसीके आने की आहटमें तुम्हारे आने का इंतज़ार पाया ........

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कब मिलो ? कैसे मिलो ? बस ये तय करने में हर शाम जाया कर देते हो ,

मिलते हो शिकवे और गीले करके बस वक्त को रेत के टीलेकी तरह तोड़ देते हो ,

शायद ये ही तो वजह है की अब हमारी रात सपनेमें तुम्हे मनानेमें गुजर जाती है ,

सुबह एक बार फ़िर वो इंतज़ार की घडियां नए सिलसिले लिए शुरू हो जाती है .....

27 मई 2009

तुझे देखा तो ये जाना....(हास्य कविता )

तुझे देखा अय चाँद कल रात

मुझे मेरा वो टकलू पडोसी याद आया ....

तुझे देखा अय सितारे चमकते हुए

मुझे जिसके सारे कंचे छुपा देती थी वो मन्नू याद आया ....

तुझे देखा अय मेरे महबूब

मुझे गाँवमें वो तंदुरस्त भैंस के रंग याद आया ,

तुझे देखा अय अश्क उसकी आँखोंसे टपकते ,

मुझे मेरे बाथरूम के हरदम लिक रहने वाला नल याद आया ......

तुझे देखा स्टेज पर गाते हुए कल रात

मुझे मेरी मोटर साइकिल के फटा सायलेंसर याद आया .....

तुझे देखा खिलखिलाकर हंसते हुए तो

मुझे वो काले दंतमंजन के इश्तिहार याद आया .....

तुझे देखा रहा हूँ आज यूँ चेहरा लटका हुआ लिए हुए ,

मुझे "९९ -देल्ही डेस्टिनी "सिनेमा का बोमन ईरानी याद आया ........

तुझे देखा आज बिना काला चश्मा पहने हुए तो

मुझे "सिंग इस किंग " सिनेमा का जावेद जाफरी याद आया .....

26 मई 2009

कुछ तक़दीरसे मिला ....

तराशे थे जिंदगीके संगमरमरी ख्वाबोंमें तकदीरों के दायरे ,

जिंदगीके हर रंग लग रहे थे तब प्यारे हमें बड़े दिलकश भी थे ,

किसीके आने का इंतज़ार कर रहे थे हम एक नुक्कड़ कर ,

इसे तक़दीर कहें या एक टुटा ख्वाबों का मंज़र ? सामने से तुम्हारी डोली गुजर रही थी .....

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बस एक बहाना ढूंढ लिया मैंने इस जिंदगी को जीने के लिए ,

एक मुस्कराहट का पता पूछ लिया उस फूलसे ,तितली से ,

बहते झरनोंसे मुझे कुछ संगीत मिला गया ,और अधूरे फ़साने को

कुक रही कोयलसे एक नया गीत भी मिल गया .....

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24 मई 2009

एक दिन अचानक ........

देव खुराना !!

ये महज एक नाम नहीं है ...

इस नाम के साथ जुड़ी हुई है एक बहुत बड़ी शोहरत ।ये शोहरत मिली है उसके विशालतम औद्योगिक साम्राज्य के कारण!! वह कभी सफलता के पीछे नहीं भागा,बल्कि सफलता ख़ुद उसे ढूँढती हुई चली आती है .

देव खुराना समाजके निम्न तपके से था ।एक गरीब परिवार में उसका जन्म हुआ था .शिष्य वृत्ति पाकर उसने स्नातक की पदवी हासिल की थी .कोलेज के प्रिंसिपल की मेहरबानी से लाइब्रेरी के कोने में वह सो जाता था . पास में थे सिर्फ़ तीन जोड़ी कपडे . पर पढ़ाई में अव्वल . स्नातक होने के बाद एक राष्ट्रीयकृत बैंक में क्लर्क बन गया ...एक दिन किस्मत का चरखा कुछ ऐसा घुमा कि देव एक बैंक के क्लर्कमें से आज पूरे देश के प्रथम पंक्ति के सफलतम औधोगिक संस्थान का मालिक था. जुहू में अपना विशाल बंगला था .पत्नी कुसुम भी कंपनी में सक्रीय थी .माँ बाप गाँव में अब बहुत ही सुखी थे . दो बहनों का ब्याह अच्छे घरों में हो गया था .उसकी ख़ुद की दो संताने थी .बड़ा बेटा सौरभ और छोटी बेटी पुनीता. दिन पानी की तरह बहे जा रहे थे . दोनों पति-पत्नी दिन भर अपने व्यापार के विकास में व्यस्त होने के कारण बचपनसे दोनों बच्चे बोर्डिंग स्कूल में भरती थे .बेटा पंचगिनीमें और बेटी मसूरी में ....

एक दिन उनकी ऑफिसके अरुण शर्मा को देव ने अपने केबिन मैं बुलाया ।

"शर्माजी ।आपको कल दिल्ही जाना पड़ेगा .मंत्रालय से ये नया निर्यात का परवाना लेने के सन्दर्भ में सारे काम निपटा कर ही वापस आना है ." देव ने हुक्म दिया .कभी न सुनने की उसकी आदत न थी .

" सर ,मुझे माफ़ कर दीजियेगा । मेरी जगह आप मिश्राजी को भेज दीजिये .मैं कल तो नहीं जा पाउँगा ." शर्माजी ने पहली बार इंकार कर दिया .

"शर्माजी, किसे भेजना है और किसे नहीं ये मुझे तय करना है ।आपको नहीं .और आपको ही इस काम के लिए जाना पड़ेगा ." देव की आवाज में सख्ती थी .

"सर , अगर आप मुझे ही भेजना चाहते है तो मैं कल नहीं परसों ही जा सकता हूँ । कल किसी भी तरह नहीं ." शर्माजी ने पलटकर जवाब दिया .

"पर क्यों ?" अब देव के स्वर में गुस्सा साफ नजर आया ।

"सर ,कल मेरे बेटे का जन्मदिन है ।मैंने उसे वादा किया है कि मैं पुरा दिन उसके साथ ही गुजारुंगा. सर ,मेरी जगह कोई और दिल्ही जा सकता है पर मेरे बेटे की इच्छा तो बाप होने के नाते सिर्फ़ मुझे ही पुरी करनी है ."ये कहते हुए शर्माजी कोई भी प्रतिक्रिया देखे बगैर केबिन छोड़कर चले गए .

आज पहली बार देव खुराना बुत बनकर कुर्सी पर लंबे समय तक बैठ कर कुछ सोचता रहा । उसने चुप्पी साध ली .देव सोचने लगा की आज उसका बेटा कितने साल का हो गया है ?आखरी बार उसे शायद ६ महीने पहले दीवाली पर ही देखा था .फोन पर उसकी आवाज सुने २ महीने हो चुके थे .उसकी संतान के बोर्डिंग के कमरा नंबर भी उसे मालूम न थे . उनकी सार जिम्मेदारी कुसुम ही निभाती थी . और बहुत अच्छी तरह निभाती थी .पुनीता जब चार साल की हुई थी तब शायद उन्होंने उसका बर्थ डे मनाया था . घर पर माँ बाबूजी से भी दो महीने से वह बात नहीं कर पाया था .

आज शर्माजी की बात सुनकर वह बेचैन हो चुका था ।खेर उसने मिश्राजी को ही दिल्ही भेज दिया .आज शाम लौटते वक्त अपनी बी.एम्.डबल्यु.में उसे गर्मी लग रही थी .नजर बाहर थी पर दिमाग कहीं और ....

रात आठ बजे ही खाना खाकर वह जल्दी ही अपनी स्टडी में चला गया ।कुसुम को ये कुछ अजीब लगा .दरवाजा अन्दर से बंद करके उसने पहले मसूरी फोन लगाया . हॉस्टलकी अधिकारी ने बताया सारे बच्चे सो चुके है आप सुबह फोन करें .

अब पंचगिनी फोन जोडा।थोडी देर में ही सौरभ सामने के छोर पर आया .

"हेल्लो ।कौन है ?" सौरभ ने पूछा .

"बेटे ,मैं तुम्हारा पापा ..."देव ने जब ये कहा तो सौरभ खुशी से उछल पड़ा ।

"पापा ,सचमुच आप बोल रहे है ?" अभी भी सौरभ को यकीं नहीं हो रहा था ।

फिर तो बातों की लम्बी बौछार हुई । दोनों उसमे भीगते रहे .

जब फोन रखा तो शायद देव के दिल में वह खुशी थी जो उसने पहले कभी महसूस नहीं की थी ...

उसे एक बार शर्माजी फ़िर याद आ गए ।

दूसरी सुबह देव जल्दी उठकर नहा धोकर कहीं चल दिया ।टेबल पर चिठ्ठी छोड़ दी की वह किसी काम से टैक्सी से पूना जा रहा है .कुसुम के लिए ये कोई नई बात नहीं थी .

आज वह एक मामूली दुकान पर गया ।सीधे सादे कपड़े और चप्पल ख़रीदे .बदल कर जब आयने में देखा तो ख़ुद अपने आप को पहचान नहीं पाया .मरीन ड्राइव पर आधे घंटे चना जोर गरम खाता बैठा रहा .

बड़े आदमी का चोला उतार कर वह अपने आपको बहुत ही हल्का फुल्का महसूस कर रहा था ।ट्रैफिक सिग्नल पर उसके दोस्त मंजीत ने भी उसे नहीं पहचाना तो वह बहुत खुश हो गया . एक इरानी रेस्तोरां में बैठ कर उसने चाय के साथ वडा पाऊं खाया .बड़े ही लिज्जत से यार !!!

उसे अपोइंटमेंट ।सेल फोन ,सेल्यूट , ऐ सी केबिन के बगैर की इस खुली हवा में साँस लेना अच्छा लगा .

तीन बजे वह पास के सिनेमा होल में पिक्चर देखने गया ।स्टाल का टिकट लिया . उसका तो घर में ही अपना थियेटर था .कभी कभार मल्टी-प्लेक्स में पत्नी के साथ गया था .वहां की कान में फुसफुसाती हुई बातें ,मादक खुशबू से महकते लोग ,मेक अप से लिपटे चेहरे ,मंहगे बेव्रेजिस और नाश्ते सर्व करते काउंटर सब यहाँ नादारद था .अपने पास के सबसे नए कपड़े पहनकर एक आम इंसान के परिवार खुशी खुशी फ़िल्म देखने आए थे .इंटरवल में जब पापा समोसे और क्रीम रोल लेकर आए तब उनके चेहरे पर छलकती खुशी अपने बच्चों के चेहरे पर देखना शायद देव की किस्मत में नहीं था .

यहाँ की आवाज में जिन्दगी का नर्तन था ।जिन्दगी जैसे खुशियों के जाम छलकाती थी .अच्छे गानों पर लोग सिटी बजाते थे . देव के पास ये खुशी खरीदने का कोई डेबिट या क्रेडिट कार्ड नहीं था . हाँ कई और बैंक के क्रेडिट कार्ड जरुर थे .

शाम को एक अच्छा सा तोहफा लेकर देव शर्माजी के घर गया ।उनकी खुशी में शामिल हुआ . उसने ये बात कुसुम को न बताने की हिदायत उन्हें दी .

रात की विमान की उड़ान से वह दिल्ही होते हुए मसूरी पहुँच गया । कंप्यूटर पर इंटरनेट के जरिये उसने पुनीता का तबादला मुम्बई की स्कूल में करवाया .पुनीता अपने पापा से प्यार से लिपट गई .

सब समान बांधकर दोनों वहां से पंचगिनी पहुंचे ।सौरभ को साथ लिया . चौथे दिन की सुबह में जब कुसुम ने घर का द्वार खोला तब वह देखती ही रह गई की ये कोई सपना तो नहीं था ?!!!

वह ये सपना था जो कुसुम ने हमेशा देखा था पर वह जुबान पर कभी ला नहीं पाई थी और आज उसके पति ने सच कर दिया था ।

अब तो देव और कुसुम माँ बाबूजी को भी मुम्बई लेकर आ गए है ।

सुबह दोनों बच्चों को देव स्कूल छोड़ कर ऑफिस जाता है और शाम को ख़ुद ही लेकर लौट जाता है ।

रात को डाईनिंग टेबल पर सभी एक साथ बैठ कर खाना खाते है .जिंदगी तब चहकती है ,महकती है ,रूठती भी है और मनाती भी है ...पर हर खुशियों का वह आशियाना बन जाती है ....

23 मई 2009

बिन तेरे क्या ?????

बिन तेरे नमक... क्या दाल ? क्या पुलाव ?

बिन तेरे चीनी.... क्या मिठाई ? क्या चाय ?

बिन तेरे पेंट..... क्या कुरता ? क्या शर्ट ?

बिन तेरे जूते..... क्या स्टोकिंग ? क्या जुराब ?

बिन तेरे मेक अप.... क्या हुस्न ? क्या शबाब ? ( ओरिजिनल कैसा होता है ?)

बिन तेरे बाल.... क्या विग ? क्या टाल ?

बिन तेरे मयूर.... क्या मेघा ? क्या नाच ?

बिन तेरे भैंस... कैसा दूध ? क्या पनीर ? क्या चीज़ ?

बिन तेरे पेट्रोल.... क्या स्कूटर ? क्या कार ?

बिन तेरे पानी.... क्या समुन्दर ? क्या कार

और जिंदगीमें मेरी ...............

बिन तेरे मुंगदाल की ढीली ढीली खिचडी , रसेदार मसालेदार आलू -बेंगन -टमाटर की खट्टी मीठी सब्जी और ताज़ी छाश ....

क्या भूख ? और क्या प्यास ...?

22 मई 2009

ऐसे आई तुम .....

सहरमें खिलती धूपसी तेरे चेहरेकी रंगत देखी

तो लगा अब मेरी जिंदगी की सुबह हुई .......

तुम्हारा वो शर्माकर नज़रें झुकाना फ़िर पलकोंको उठाना

देखा तो लगा अब मेरी जिंदगीमें रौशनी हुई ......

तुम्हारा वो हौले हौले से हंसना मेरी उस बात पर

सुना तो लगा जैसे मेरी जिंदगीमें बरसात हुई ..........

तुम्हारे ताज़ा धूले गेसुओंसे फैली कुछ खुशबू फिजाओंमें

मुझे लगा अबके जिंदगी की पहेली बसंत बहार बनकर आई ......

21 मई 2009

कुछ उलझा फ़िर भी सुलझा सा ...

बंध पलकोंमें झांखते है कभी ऐसे दिल के आयने में ,

खुद की खुद से कशमकश सुलज़ जाती है ,

किसी बेकसूरसे की गयी नाइंसाफीको रहमे करम अदा करते हुए

हाले दिल इश्कमैं क्या है वो बात शायरीमें बयां हो जाती है .....

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इश्क हमारा किसीकी रहमोकरमकी पनाहमें नहीं

हम जानते है किसीको शिद्दतसे इश्क करना कोई गुनाह नहीं ,

ये मंज़र है प्यार का ,जहाँ पर गुनाहगारकी हर खता माफ़ की जाती है ,

और कभी बेकसूरको उम्रभर तड़पनेकी सजा फरमाई जाती है .....

20 मई 2009

एक अजनबी ....

सूरज आया आज होठों पर लिपस्टिक लगाकर ,

मुझे वह अजनबी लगा ....

दोपहरमें धुप आई काले बादलका दुपट्टा ओढ़कर ,

मुझे वह भी अजनबी लगी ....

देखो मेरी सहेली ये जिसके साथ गिट्टे खेली थी अब तक ,

दुल्हनके जोड़ेमें वह भी मुझे अजनबी ही लगी .....

घरकी खिड़की से कांच तोड़कर जिसकी गेंद घरमें आती थी ,

वह हमजोली वातानुकूलित केबिन के अन्दर

कंप्यूटर पर उँगलियाँ रगड़ता हुआ

बड़ा अजनबी लगता है .........

चावल भी सफ़ेद की जगह गुलाबी लगे और हरी सब्जी लगी पिली

आज खाने की थाली में भी लागे मुझे सब चीजें अजनबी ....

समज न पाई ये क्या माज़रा है ?

अरे हाँ !!!कल रात सपनोंमें कल एक अजनबी से मुलाकात जो हुई थी .......!!!!

19 मई 2009

तेरे कानकी बुँदे .....

मनमें एक कसक सी उठती थी जो उस चौराहेसे होकर कभी गुजरते थे ,

कभी आशियाना था मेरा जो ,उस जगह एक खंडहर सा खड़ा था .......

एक पलके लिए अन्दर जाने को दिल किया और चले भी गए ,

हर कौना उस घर का मेरी यादों को समेटे अभी मेरे इंतज़ारमें था .....

उस अलमारी को खोलकर देखा वहां थोडी सी गर्द को साफ़ किया ,

वो तुम्हारी कान की बुँदे जो लाया था कभी अभी वहीं पड़ी थी .......

18 मई 2009

भारत का दिल : राजधानी दिल्ही .....

जहाँ हमारे देशमे नई सरकार केन्द्र में बनने जा रही है उस देल्हीकी सैर पर चलें ????दिल्ही हमारे देश की राजधानी और भारत का दिल !!!! ठीक उसी जगह पर बसा हुआ है जैसे इंसानी जिस्म में दिल जहाँ पर बसा है । ऋषिकेश से हम बस यात्रा करते हुए निकले . रस्ते में ज्वालानगर ,रुड़की ,सहारनपुर ,मेरठ आदि शहरों के मध्य से होकर हमारी बस गुजरी. उन जगहों की झलक देखते हुए हम आखिरकार दिल्ही पहुँच ही गए . कश्मीरी गेट के पास अंतर्राज्य बस अड्डे पर हम उतर गए . वहां से पास ही 'गुजराती समाज' एक रुकने का सबसे बढ़िया विकल्प है . वहां पर रूम तो नहीं मिला पर door metary में जगह मिल गई . सामान सारा क्लोक रूम में रख कर हम थोड़ा नाश्ता पानी करके फ्रेश हो गए और निकल पड़े घूमने को . पैदल चलके दिल्ही -हरियाली दिल्ही को देखने का लुत्फ़ ही कुछ और है . बशर्ते यहाँ के ठग और गुंडा गर्दी से अवश्य सतर्क रह कर ही . थोड़ा थक जाओ तो साइकिल रिक्शा में घूमने का भी आनंद आता है . मेट्रो स्टेशन में जा कर हमने चार स्टेशन दूर शहादरा की टिकट लेली .बस हमें तो वह चमचमाती ट्रेन में एक बार घूमने का आनंद लेना था . यह ट्रेन कोलकाताकी तरह भूगर्भमें नहीं चलती पर जमीं से ऊपर चलती है . स्टेशन पर कदम रखो तो किसी विदेश में आ गए हो ऐसा महसूस होता है .कोई टिकट चेकर नही . अन्दर जाने के लिए मशीन में टिकट डालते ही अन्दर चली जाती है और दरवाजे से हम अन्दर जा सकते है .दूसरे छोर पर टिकट बाहर आ चुकी होती है उसे लेकर अन्दर चले जाओ .बहुत ही सुंदर और साफ सुथरी जगह है . नियत समय पर आई गाड़ी में सवार हुए . centrally airconditioned and throgh out pasaage वाली गाड़ी है . शहादरा उतर कर बाहर जाकर फिर वापस आए . फिर कश्मीरी गेट पहुँच गए . वहां पर तब भूगर्भ रेलवे मेट्रो का मार्ग बन रहा था . वहां पर खाली खाली ऐसे ही चढ़ने उतरने का बड़ा आनंद आया . फिर लौट गए . वहां पर परिसर मैं ही एक travel agency है जहाँ से हमें दिल्ही दर्शन ,वन डे टूर -आगरा ,मथुरा ,वृन्दावन के लिए जाने की सुविधा मिल जाती है . इस जगह परिसर में ही किफायती रूम में ठहरने की व्यवस्था के अलावा पूर्णतः गुजराती खाने की थाली ,चाय नाश्ता सबका प्रबंध है . इधर से आप उत्तरांचल जा रहे हो तो गुजराती नाश्ता भी अच्छा और सस्ता मिल जाता है .हमने दूसरे दिन सुबह की छोटी सी मिनी बस में दिल्ही दर्शन के लिए बुकिंग करवा ली . रात में डोरमेटोरीमें सोने का अनुभव कुछ अलग ही रहा . हमेशा सुविधा जनक स्पेशल रूम में रहते थे इस लिए थोड़ा अटपटा सी लगा पर अगर प्रवास में कोई असुविधा का सामना न करना पड़े तो मजा भी नहीं आता है .

दूसरी सुबह हमें रूम मिल गया । हम वहां पर तैयार हो कर दिल्ही दर्शन के लिए निकल पड़े . पहला पड़ाव था लाल किला . लाल किला -मुग़ल बादशाह शाहजहाँ की एक ऐतिहासिक देन -भेंट भारत भूमि को .२००३ में हम यहाँ पर सिर्फ़ ६ घंटे के लिए ही रुके थे तभी हमने यह देख लिया था . दीवाने आम , दीवाने खास , रानियों के महल , राज सभा का स्थान , मयुरासन का स्थान , कला कारीगरी से भरपूर स्थापत्य , एक छोटा संग्रहालय, मीना बाज़ार सब देख लिया था अतः हम बाहर ही घुमते रहे .

यहाँ पर हमारा देश स्वतंत्र हुआ तबसे हमारे प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से लेकर आज तक के सब प्रधानमंत्री हमारे देश की शान तिरंगे के हमारे स्वतंत्रता के दिन फहराते है । उस गौरव पूर्ण पल की परिकल्पना कर रहे थे . ठीक सामने है चाँदनी चोक , वहां पर एक मन्दिर बहुत ही सुंदर है . अगर आप बार्गैनिंग में होशियार हो तो अच्छी और सस्ती चीजे यहाँ से खरीद सकते हो .पुरानी दिल्ही का अक्स आपको यहीं पर नजर आएगा . दिल्ही की चाट से लेकर छोले भटूरे तक का असली स्वाद आप यहाँ पर पा सकते हो . यहाँ पर हम लगभग पांच छ घंटे तक हमारे यहाँ के पड़ाव के अन्तिम दिन घुमे थे .

उसके बाद बाहर से ही जुम्मा मस्जिद को देखा । हमारे सभी महापुरुषों के समाधि स्थल पर भी गए तब मुझे यही ख्याल आया :

रहने को घर नहीं ,सोने को बिस्तर नहीं , खाने को नहीं पेट भर अन्न ॥ऐसे कई लोगों की जरूरत बन सके ऐसी हजारों एकर जमीं यहाँ पर मृत नेताओं की समाधि के पीछे लगाई गई है । बहुमूल्य पानी का उपयोग यहाँ पर हरियाली बनाये रखने किया गया है .?!!! हाँ महात्मा गांधीजी ,पंडित नेहरू , लालबहादूर शाश्त्रीजी की समाधि तक तो ठीक है की उन्होंने हमारी स्वतंत्रता के लिए मुख्य योग दान दिया था ..पर बाकी के ????

अब हमने इंडिया गेट का रूख किया , संसद भवन ,नॉर्थ ब्लोक ,साउथ ब्लोक , राजपथ को पैदल चलके बाहर से ही देखा । दिल्ही की शोभा यहाँ देश की राजधानी के अनुरूप ही है .उसके बाद सुप्रीम कोर्ट भवन , आकाशवाणी भवन बाहर से ही देखा . एम्बेसी मार्ग भी देखा . १,सफदरगंज ॥हमारी स्वर्गीय प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी का निवास स्थान जो हम अब राष्ट्रीय स्मारक के रूप में देख सकते है .सुंदर घर ,फर्नीचर और अलभ्य तस्वीरें देखने को मिली . उनकी हत्या हुई थी उस स्थान को भी देखा जिसे चारों बाजु से सुरक्षित कर दिया गया है .

तीन मूर्ति भवन - एक विशाल जगह में बना एक विशाल और आलीशान भवन जो हमारे पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू का सत्तावर निवासस्थान था वो देखा । अत्यन्त सुंदर है . वहां इन्दिराजी के बचपन की यादें फर्नीचर के साथ सुरक्षित है .

हमारा अगला पड़ाव था बिरला हाऊस-महात्मा गांधीजी की उसी जगह हत्या कर दी गई थी । उनकी अन्तिम यात्रा चरणों को उभार कर दर्शाई गई है . हत्या के स्थल को भी ..... एक महान विभूति को मेरा कोटी कोटी वंदन !!!!

गाँधी स्मारक -महात्मा गाँधी के जीवन से जुड़ी हर चीज का एक अलभ्य संग्रहालय है । वहां पर गांधीजी के जीवन की हर दुर्लभ तस्वीर मौजूद है . लेकिन मैं अभिभूत हो गई गांधीजी की हत्या के तुरंत बाद की तस्वीर से जहाँ देश की अखंडता और एकता के लिए एक इंसान ने अपने बहुमूल्य जीवन की आहुति दे दी और उसका नाम इतिहास के स्वर्ण पृष्ठ पर अंकित हो गया . एक इतिहास लिखने वाला इंसान इतिहास की गर्ता में विलीन हो गया ...

कुतबुद्दीन ने बनाया कुतुब मीनार हम कैसे भूल सकेंगे । पुरातत्व विभाग ने पुरा ध्यान देकर उसके रख रखाव का कार्य संभाला है . प्राचीन इमारत की तवारीख में दिल्ही के इतिहास के साथ इसका नाम भी अमर रहे उतनी आसमान को छुलेने वाली बुलंदी है इसकी ॥ पास में ही लोह स्तम्भ ४०० वर्ष पुराना लोहे का स्तम्भ पर आज तक जंग नहीं लगी है . बड़ा अच्छा ऐतिहासिक स्मारक है . रात में यहाँ पर लायिटिंग की जाती है तब ये और भी भव्य लगता है .

जब हम वहां गए थे तब वहां पर स्वामिनारायण मन्दिर का कम अभी पूर्ण नहीं हुआ था । पर अब ये भव्य मन्दिर भी एक दर्शनीय स्थलों की लिस्ट में शामिल हो चुका है . जंतर मंतर भी देख ही लो . ग्रह दशा में ऐसे घूमना-फिरना लिखा है या नहीं ???

भवानी गंज का कात्यायनी माता की शक्ति पीठ मन्दिर देखा । वहां पर एक द्वार ऐसा है जो सिर्फ़ चैत्र और अश्विन माह की नवरात्रि में अपने आप ही खुलते है और नवरात्रि के समाप्त होते ही बंद भी हो जाते है ।

एक भव्य इमारत जिसे हम लोटस टेम्पल कहते है वह भी देखा । खूब सुंदर और अवर्णनीय इमारत !! आखिर मैं हम इस्कोंन मन्दिर गए . वहां की भव्य संध्या आरती की . वहां के लाईट और साउंड शो को देखा . बहुत ही रोचक लगा . दिल्ही के भव्य मार्ग पर होते हुए रात को हम वापस आ गए हमारे पड़ाव पर .

एक दिन हमने स्वेच्छा विहार भी किया जब हम गए पालिका बाज़ार के airconditioned market और कोनोट प्लेस । खूब पैदल घुमे . लीची के फल का आनंद भी ले लिया . रिच और फेमस लोगों की यह शोप्पिंग की जगह है .

दिल्ही के लंबे चौड़े रस्ते , भव्य फ्लाई ओवर भुलाए नहीं भूलते ।खूब हरियाला शहर है ये नई दिल्ही . बस अगर न देखा हो तो एक बार तो देख कर आओ ...

नोट :आप इस जगह के चित्र गूगल इमेज सर्च से जाकर देख सकते है ...

17 मई 2009

जानबूझ कर की गुस्ताखी तो .....

बस आज ये तय कर लिया हमने ,न सोचेंगे आज आपके बारेमें अब ,

ये दिल पर काबू नहीं हमारा इसी लिए उसे उसने सिर्फ़ आपको ही सोचा ...

खतावार ये ऐसा है फ़िर भी इसकी सज़ा न तय कर पाए कभी ,

इसकी नाफ़रमानी की गुस्ताखी हंसकर सहना भी सिख लिया है अब .......

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आज दिल में इतना दर्द क्यों हो रहा है ???

कुछ टुटा हो ऐसा क्यों लग रहा है ???

तब जाकर पता चला हमें इश्कका बुखार चढा था जो ,

आपके चप्पल पड़े जब तो ये उतरने लगा है .....

16 मई 2009

कभी खुशी कभी गम .....

आज एक बार फ़िर मेरी जिंदगीके एक नियम एक फलसफे को बांटना चाहती हूँ :

हम जिंदगी में गम ज्यादा और खुशी की कमी क्यों महसूस करते है ?

=हम कोई भी काम करने से पहले उसके अपेक्षित परिणाम भी ख़ुद ही तय करते है ...हर काम का जो भी परिणाम होता है वह कई परिबल पर निर्भर होता है .हम सिर्फ़ एक कर्म वो भी पुरे दिल से कर सकते है .अगर परिणाम अपेक्षा अनुसार होते है तो खुश वरना सिर्फ़ शिकायत करते है और ढूँढते है बहाने की क्यों हम नाकामियाब है ?इस चीज़ को हम हर आनेवाले पलोंके साथ खींचे चले जाते है और इसी लिए हमारे लिए गम के पल होते है उससे भी अधिक नज़र आते है ....और खुशी का कोई पल मिले तो उसे भी घसीटते जाते है ..एक कामियाबी को इतना लंबा खींचते है की आगे बढ़नेके रास्ते ,अपने में और अधिक सुधार की गुन्जायिश कल्पना नहीं करते ...

वक्त के साथ जियो ..कोई पल कायम नहीं ..आज का गम कायम नहीं कल खुशी का रास्ता खुला ही है ...ये खुशी के पीछे अगर कोई गम आए तो बर्दाश्त करने की तैयारी भी है ...

मैंने जब कोई पोस्ट लिखती हूँ और देखती हूँ की जिसे मैंने अपने वजूद को निचोड़कर लिखा होता है वह लोगों को कम पसंद आई ..उस पल मैं सिर्फ़ ये सोचती हूँ शायद कुछ तो कमी है चलो अगली बार जरूर गौर करुँगी ..कभी कभी हलके फुल्के तरीके से लिखती हूँ जो बस यूँही लिखा होता है तो वह लोगों को बहुत पसंद आती है ...पर ये बात से परे रहेकर वह गम और वह खुशी उस दिन उस पल तक ही सिमित रखते हुए बस लिखती हूँ ...अगर लोगोंके विचारोंसे प्रभावित होकर मैं हताश हो जाऊं या लिखना छोड़ दूँ तो उसमे सबसे बड़ी नाइंसाफी तो मैं ख़ुद के साथ ही करुँगी ....

इस तरीकेसे जीना शुरू किया तबसे मेरी जिंदगी में खुशी के पल ज्यादा और गम को खुशी में तब्दील करने की चाबी हाथ आ गई ...संसारमें रहते है तो कहासुनी भी हो जाती है पर कुछ पल खामोशी के बाद ठंडे दिमाग से सोचते है और लगता है की गलती हमारी है तो बिना संकोच माफ़ी मांग लेते है ..और अगर सामने वाले की हो तो सोचते है की कितना प्यार है हम लोग में !!!!बस एक छोटी बात के लिए हम उससे नाराज़ हो गए !!! चलो माफ़ करदो ...उसे भी !!! और इस बात से रिश्ते की गहराई और बढ़ जाती है और वह अटूट हो जाता है ...ग़लतफहमी कम होती है ...खुशी ज्यादा और गम कम .......

एक फिल्मी गाना है जो मुझे बहुत पसंद है : फ़िल्म " जब वी मेट " का :

हम जो चलने लगे चलने लगे है ये रास्ते

हाँ मंजिलोंसे बेहतर लगने लगे है ये रास्ते .....

15 मई 2009

मेरी प्रेरणा

जिसने मेरी धड़कनोंको सुना,

जिसने मेरे ख्वाबोंको सींचा,

हौलेसे खोले जिसने मेरे पंख,

मेरी कसकसे रोई जिसकी आँख,

कैद मुजे है कर लिया सलाखोंमैं प्यार की ,

फिर भी उडान संग उसके भरी मैंने खुले आसमानकी,

अय मेरे ख्वाब और उसकी ताबीर,

चुराके रख लिया है तुम्हे जहाँ से ऐसे ,

तुम्हारा नाम भी जबान पर न लाऊंगी......

14 मई 2009

शिकायत कर लो ......

दिलसे कुछ आहट आई ,

अरमानोने ली भली सी अंगडाई ,

उठती हुए खयालोंने शब्दकी एक शमा जलाई ,

और देखो उससे उठती लौने तेरी तस्वीर बनाई .............

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आँखोंसे बहा ये काजल गालों पर यूँ बिखरा ,

जैसे एक लटमें सिमटी काली सी रात चाँद पर निखर गई ......

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तेरे हुस्न को लब्जोंमें कैसे कैद करें हम ?

हर कैदसे आजाद सी खुशबू बन बहती है सबामें ..........

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हरदम शिकायत करते हो नींद नहीं आती ,

यादोंको समेटकर दामनमें नींदमें ही आप जगा करते हो .............

13 मई 2009

शब्द निशब्द ....

एक छोटा सा सफा

एक बारीक़सी दवातकी नोंक ,

कुछेक बूंद स्याहीके......

जब स्याही दवातको भीगोकार

कोरे सफे पर थिरक जाती है

तब एक शब्दको जनम दे जाती है ...

जिसकी गहराई अनंत

जिंदगीके हर रंगकी हुबहू जिन्दा एक तस्वीरसी .....

एक पल एक जज्बात

जब एक शब्दमें हुए कैद ...

चुरा लेते है दिल

नम करते है आंखोंको

हंसा देते है भीगे लबोंको भी .......

एक हया ,एक अश्क ,एक मुस्कान

न जाने क्या क्या छुपा है इसकी चिलमनमें ????

ढूँढनेके लिए एक जिंदगी कम पड़ जाती है

शब्द खो देते है पहचान किसीकी

कभी शब्दसे किसीकी पहचान बन जाती है ............

12 मई 2009

अय हवा सुन जरा ....

हवा तू है इक शरारत ,
हवा एक चूभन, तू एक सीलन ,
मुझे छू छूकर बह चली तू कहाँ ????
तेरे परों पर आई है मेरे दर पर उनकी खुश्बू....
इन हवाको मुठ्ठीमें कैद तो कर लू जरा ....
साँसोंमें भर तुम्हे हवा उनका रुखसार चूम लूँ जरा
ठहर जा बस एक पल के लिए ......
भीनी सी खुशबू कभी ,कभी कांपती सिहरन तू ..
तपिश कभी झुलसाती हुई अगन सी ,
ठंडी पुरवाईसी सिरहाने बैठ सहलाती यूँ रातोंमें ,
कानोमे एक दिलकश नगमेसी गुनगुनाती सरसराहट तुम ...
तेरे कानोंमें एक पयगाम जो दिया हमने ले उसे ,
बस उनके कानोंके पास से गुजर जाना ,
चेहरे पर बनकर एक हंसी उनके ,
मेरे जज्बातको कह जाना ..........

11 मई 2009

एक कश्मकश ....

जहाँ पर नज़र रूकती है रुख तेरे आशियाने का है ,

आँखें मूंदते है मगर दीदार तेरे ख़यालमें होते है ,

इसे इश्क का आलम समज़नेकी गुस्ताखी करे कैसे ?

दिल टूट जानेके अंजामसे डरते है ...........

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एक बार आपके दिल पर इख्तियार आ जाने दो ,

मुझे अपने दिलसे भी इसकी इजाज़त मांगने दो ,

कितनी साँसे बाकी है अब उसका तो पता नहीं हमें ,

जुदाई लिखी तक़दीरने फिरभी अपनी आखरी साँस पर इश्क कर लेने दो .......

10 मई 2009

हैप्पी मधर्स डे

Mother's Day in 21st century....
मेरी प्यारी मोम ....
हैप्पी मधर्स डे.......
फ्रॉम योर लविंग सन एंड डॉटर ...........


मोम आपको पता ही होगा
हमारी लाईफ कितनी बिजी हो गयी है न ?
तेरे पास 2 minutes बैठने का वक्त भी नहीं मिलता...
so sorry ....
तेरी गोदमें लेटकर सोने का नसीब कहाँ ???


आज का दिन जब बना तेरे लिए ही है
हम तुझे तहे दिल से याद करते है ....
पर आज बच्चोंको फिल्म दिखने का वादा किया
है तो तुझे फोन पर ही विश कर लेते है .......


माँ , तू बहुत ही समजदार है ,
मजबूरी हमारी जरूर समजती होगी ,
तेरे कितने एहसान है हम पर ये कभी न गिनती होगी ,
आज भी तेरे दिलसे तो हमारे लिए दुआएं ही निकलती होगी ,
हमारी मोमसे प्यारी कोई दुनिया की कोई मोम न होगी !!!!
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दस मिनट के बाद : वृद्धाश्रमके रूम नंबर: ११ में
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मोतियाबिंद से धुंधली बनी नजर पर
बूंदे आ गयी है आंसूकी पलक पर ....
पुरानी साडीसे पोंछ लिए उसने हौलेसे ,
चलो इतना ही काफी है
मेरी संतानने मुझे याद कर लिया आज के दिन .......
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उस माँ को कुछ याद आया
इन बच्चोके बचपनके गुजरे हुए साल आज .....
१... "शांताबाई , बिट्टू और सोनू स्कुलसे आ जाए तो उनको दूध दे देना ...मैं ऑफिस जा रही हूँ ...
२॥ बिट्टू और सोनू देखो हम आपके लिए कितने सारे खिलौने लाये है ???
३... "मॉम, आज मुझे बुखार है प्लीज़ छुट्टी ले लो...."नो बेटा ,आज एक important meeting है ...जाना ही पड़ेगा
४... बिट्टू और सोनू जल्दी सो जाओ , हमें डेडीके साथ पार्टीमें जाना है .....
५....सोनूके जन्मदिन की पार्टी के बहाने business meeting .......

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9 मई 2009

सौन्दर्य की परिभाषा :गंगोत्री ...महेसूस कीजिये ...

जानकी चट्टी से होते हुए फ़िर एक बार लौट कर बारकोट आना पड़ता है. रात ठहर कर फ़िर सुबहमें हमारी यात्रा प्रारंभ हो जाती है .यमुनोत्री की चढाई थकानवाली रही .रात भर सभी बेखबर सो गए . एक और हसीं सुबह शुरू हो गई नए सफर के साथ .गंगोत्री तक जाने का रास्ता शुरू से ही बड़ा ही सुहाना है .उसके पेड़, रस्ते और पहाड़ की एक नई ही तासीर देखी.सूरज की मस्त किरणे हमारे शरीर को यहाँ जला नहीं सकती क्योंकि सर्द हवाएं उसे नर्म बनती रहती है . नीरव शान्ति का साम्राज्य है . मन के भीतर और खिड़की के बाहर .रस्ते में एक छोटा मन्दिर पड़ा . थोडी देर उतरकर पैदल चले . थोड़े और दूर जाने पर गुप्त गंगा का मन्दिर आता है ।छोटी सी चढाई है . बाद में एक छोटे से द्वार में होकर गुफा के अन्दर शिवलिंग है .पुरी जगह घुटनों तक पानी से भरी हुई है . ये पानी कहाँ से आता है और कहाँ जाता है यह रहस्य ही है . अन्दर टोर्च लेकर जाना पड़ता है . अँधेरा ही है . बाहर आकर सूखे पत्तों की बिछी कालीन पर चलते हुए और निर्मल बहते झरने का पानी पीते हुए हम फ़िर आगे चल पड़ते है .थोड़ा और आगे ....थोड़ा और आगे ... आगे चलने पर पहली बार गंगा का दर्शन हुआ .श्वेत प्रवाह ....जमुना का प्रवाह तो पुरा नीला था . और ये सफ़ेद ......बोलो गंगा मैया की जे !!!!!!!!

अब एक मैदान नुमा जगह आती है और ये है उत्तरकाशी ।थोड़े साल पहले यहाँ पर भूस्खलन के कारण एक पुरा चार मंजिला होटल खँडहर मैं तब्दील हो गया था .आगे एक पॉवर हाऊस आता है .

एक बार फ़िर प्रकृति करवट लेती है । हरी भरी वादी बड़ी बड़ी चट्टानों में बदल जाती है .तीव्र मोड़ ॥पथरीला रास्ता . दो विदेशियों को मोटर साइकिल पर जाते हुए देखा . उत्तरकाशीसे ३९ किलोमीटर की दुरी पर गंगनानी नामक जगह आती है .यहाँ पर गर्म पानी के कुंड है . अच्छी तरह पक्की बंधी हुई जगह है . महिलाओं के लिए अलग व्यवस्था है . चाय नाश्ता भी कर सकते है . यहाँ नहा धोकर गंगोत्री जाना बेहतर है . और आगे का रास्ता फ़िर पथरीला है . एक शिला १०' x १०' के साइज़ की ऊपर लटक रही थी जाने का रास्ता ठीक निचे है . बाप रे ....एक बार तो सोच ही लेते है ..कहीं गिरी तो ?

हमारी गंगा तो पूरे मस्ती के माहौल से गुजर रही है। कहीं पर २५फ़ीत् तक चौडी तो कहीं पर चार फीट में सिमट कर १० फीट ऊँचे से छलांग लगाती है . बस देखते ही जाओ ...कहीं तीन चार अलग धारा में बंट जाती है और कहीं एक हो जाती है . अब शुरू होता है सात पहाड़ का सफर . रास्ता एक के बाद एक सात पहाड़ से गुजर कर आगे बढ़ता है . और उसके बाद शुरू होती है देवदार के ऊँचे पेडोंकी कतारें ...पहाडी हुश्न का एक और मकाम .कहीं कंही बर्फ बिखरी पड़ी है ॥ गंगा तो दिल खोल के गाती रहती है .

हमारे ड्राईवर ने कहा इस जगह का नाम हर्षिल है । ये जगह गंगनानी से ३२ किलोमीटर की दूरी पर है . यहाँ पर राज कपूर की प्रसिध्ध फ़िल्म 'राम तेरी गंगा मैली ' की हिमालय के दृश्य वाला पुरा हिस्सा फिल्माया गया है .अब अगर सो रहे हो तो जाग भी जाओ . एक पुरानी फ़िल्म का सुंदर मुकेश वाला केसेट निकालो और बजाओ .प्रकृति की ये सुन्दरता के दर्शन बड़ी किस्मत के बाद मिलेंगे . भैरों घाटी ये इस सुंदर जगह का नाम .नीली जहान्वी और सफ़ेद गंगा का संगम है . मेरे इस लेख का शीर्षक यहाँ पर सार्थक होता है . यह पुरी वादी सौंदर्य की एक परिभाषा है ......

और अब हम पहुँच चुके है गंगोत्री .......

यमुनोत्री की कठिन चढाई यहाँ नहीं है । सीधे ही मन्दिर के द्वार के पास वाहन ठहरता है .अगर थोड़े जल्दी पहुंचे तो रात तक उत्तरकाशी लौट सकते है .गंगा का जो सौंदर्य आप यहाँ देखते है वह कहीं पर भी नहीं है .यहाँ पर गेस्ट हॉउस के अलावा इशावास्यम नामक जगह है जहाँ पर आप निशुल्क ठहर सकते है और भोजन भी निशुल्क ही मिलता है जाते हुए आप कुछ भी रकम स्वेच्छा से दान में दे सकते है . हम प्रायः गेस्ट हॉउस में ही रुके . फ्रेश होने के बाद गंगोत्री मन्दिर दर्शन करने गए . हमारा होटल गंगा प्रवाह और मन्दिर के दुसरे किनारे पर था . एक सुंदर पुल पार करके हम गए . बहुत ही खूबसूरत मन्दिर है . प्रसाद वगैरह लेकर भोजन के लिए इशावास्यम में गए . ये स्थान सुमुद्रतल से १०००० फीट से भी ऊपर है . पुरी बर्फ से लिपटी हुई ....आंखो से देखो और रूह से महसूस करो ....

अगर आप गौमुख तक जाना चाहते है तो रात्रि मुकाम के बाद दूसरी सुबह ५ बजे ही घोडे वाला तय करके निकल जाए तो शाम तक लौट सकते है । गौमुख यहाँ से १८ किलोमीटर दूर है . हमारे साथी कोई तैयार नहीं थे . दो दिन रुकना किसीको गवारा न था . अतः हमें तो इधर से ही दुखी मन से लौटना पड़ा था . लेकिन हम दोबारा यहाँ पर जरूर आयेंगे और पुरी यात्रा करेंगे .यहाँ पर दही एक छोटी कटोरी २० रुपये और गर्म पानी १५ रुपये ....

प्रकृति प्रेमी और ट्रेकिंग के शौकीन लोग के लिए एक टिप है ।गंगोत्री से ९ किलोमीटर चिरबासा (११८०० फीट ) , वहां से ५ k.m. (भोजवासा), और ४ k.m. गौमुख जरूर जाएं .यहाँ से आगे लगभग १४ k.m. लगभग उतने ही दूर है तपोवन नामक जगह (१४८०० फीट ) है जिसकी सुन्दरता को आप अल्फाजोंमें बयां नहीं कर सकते .

सुबह गंगोत्री मन्दिर में दर्शन करने के बाद हम उसके किनारे पर गए । गंगा जल का आचमन किया . बड़े बड़े पत्थरोंसे बहती इस नदी का शीतल तम जल और अपार फैला हुआ विराट सुन्दरता का साम्राज्य ....!!!!जल को सर ऊपर चढाते वक्त में रो पड़ी . भगवान् को कहा THANK YOU GOD !!! मुझे आपने इतनी खुश नसीबी दे दी की मैं गंगा को उसके उदगमस्थान से देख पायी हूँ !!!! आप को मैंने यहाँ पर देख लिया है इस अप्रतिम शोभा के रूप में !!

वापसी में हम लौटे हर्षिल रुके लगभग डेढ़ घंटे । सेब के बागीचे है . और सुंदर झरनों के समान गंगा . रात में उत्तरकाशी लौटे . रुकने के लिए सुचारू इंतजाम है . जरूरत की सभी चीजें यहाँ पर उपलब्ध है . सुंदर बाजार है ....दूसरे दिन हम यहाँ के प्राचीन मन्दिर में दर्शन करने के बाद हमारे साथियों को अलविदा कहते हुए ऋषिकेश लौट चले ....

उत्तरांचल की यात्रा यहीं पर समाप्त .... लेकिन हमारा भ्रमण अभी ख़त्म नहीं हुआ है . और भी साथ घूमेंगे हम सब ...

8 मई 2009

अरे रे अरे ये क्या हुआ ?????

एक दिन सागरको पंख मिल गए कहींसे

और वह आसमांमें उड़ चला ...

बड़े से उस गड्ढेमें फ़िर जगह देखी चाँदने ऊपरसे

चाँद आकर जमीं पर उसमे जाकर बैठ गया ......

सूरजको छूनेकी ख्वाहिश लिए दिलमे

सागर उसकी और उड़ने लगा ...

एक एक बूंद तब भाप बनकर उड़ने लगी

सागरका अस्तित्व बादलमें तबदील हो गया .....

चाँद इस दुनियामें आकर बहुत मैला हो गया ,

शोरगुल भी इतना था की दोनों हथेलियाँ कानों पर धर चला .......

परेशान होकर चाँद फ़िर आसमानमें लौट गया ,

और वह बड़ा सा बादल जो था बरसकर गड्ढेमें फ़िर सागर बन चला ......

7 मई 2009

एक दोस्तको पयगाम.....

हवाके झोंके बहते है तेज़ तुफानोंसे कभी ,

कुछ तस्वीरें खुली खिड़कीसे आकर गिरा जाते है ....

तस्वीर बेजान होती है कांचकी दरारे सह जाती है ,

फिर कभी चुभनके साथ लहू भी बहा ले जाती है ...........

पर अय दोस्त तेरी तस्वीरको नहीं तेरे वजूद की खुशबूको

दिल की दीवार पर सजा रखा है रंग अब भी ताजा है ,

कैद हो यहाँ पर दिलमें हमारे दरवाजा जिसका खुला ही है ......

हर सांस पर जिन्दा हमारे वजूदको भी कर जाते हो ........

6 मई 2009

बदलता वक्त और ये मौसम ...



हवाओंका क्या है ? वो तो ऋतुके साथ बदलती है ,

तपते सहरासे गुजरते हुए वो आगसे झुलसती है ,

बर्फकी वादियोंमें वह ठण्डसे सिहरती है ...

बदलते मौसम के साथ हवाएं भी रंग बदलती है ..


वक्तको इंतज़ार है सहरामें एक ठिठुरती शाम हो ,

बर्फकी वादीकी चोटी पर भी सूरज का सलाम हो ,

ए औसकी एक आखरी बूंद तू काफी है मेरी प्यास के लिए ,

सब्र और नहीं इंतज़ार करने का एक बार आओ मेरी साँसोंके लिए ..

5 मई 2009

मिस्ड कॉल .........

जयति एक चालीस वर्षीय महिला है ।अपने छोटे से परिवार के साथ एक छोटे से फ्लैटमें रहती है .बेटा बड़ा हो गया है. जिम्मेदारियां कुछ कम भी हो गई है .उसके फ्लैट के सामने वाले फ्लैट में एक दिन चार लड़कीयां रहने आती है .चारों बाहरसे शहरमें मेडिकल की पढ़ाई करने के लिए आई हुई है .पॉँच साल के लिए .जयति के घर की बालकनी के सामने उनकी रसोई पड़ती थी .हल्लो हाय के साथ एक नया रिश्ता जुड़ गया जो उन पांचोंको पता भी नहीं चला ....

निशा ,अरजनी ,पायल और पियूष !! सिर्फ़ नाम से वास्ता रहा उनका ।शाम को जब वह लड़कियां कोलेज से वापस आती तब सब मिलके पन्द्रह बीस मिनट तक बातें करते रहते .जयति के जिंदगी की तन्हाई में उन लड़कियोंने एक नया रंग भर दिया .हर रोज शाम का उसे इन्तजार रहने लगा .जयति खिल गई इन नई पीढी की संगतमें !!! हर विषय पर नई नई बातें : फ़िल्म ,पढ़ाई , अपने गुजरे ज़माने की और ना जाने क्या क्या ????

जयतिका स्वभाव ही कुछ अलग था ।उसे आम औरतों की तरह चुगली वाली बातें जरा भी नहीं भाती थी .नई जनरेशन उसे ज्यादा अच्छी लगती थी .उनकी विचारधारा को भी वह सही तरीके से समज पाती थी .उन लड़कियों को भी जयति में एक आंटी नहीं पर एक बेहतर दोस्त नजर आती थी ...

अपने परिवारसे दूर रहने वाली इन लड़कियों को जयति में अपनी माँ या बड़ी बहन नजर आती थी ।

पायल बड़ी शरारती थी । वह कोलेज से आते ही एक मिस कॉल करके जयति को किचन से बालकनी में बुलाती थी .फ़िर कहती ," आपका चेहरा कल देखा था तो सिर्फ़ आपको देखने के लिए ही बुलाया !!!"

जयति जूठा गुस्सा दिखाते कहती," तुम्हारी वजह से मेरी रोटी जल गई !!!"

कितना प्यारा और निर्दोष रिश्ता जुड़ गया था उन सबके बीच !!!वे सभी जानते थे उन सबको एक दिन हमेशा के लिए जुदा भी होना है !!! फ़िर भी इस रिश्तों को जीनेमें उन्होंने कोई कसर नहीं रखी । भरपूर जिया !!!जब अपना जन्मदिन होता वह लड़कियां जरूर जयति का आशीर्वाद लेने आ जाती .वेकेशनमें जब सब अपने शहर जाती तो भी जयति को जरुर याद करती .ईमेल करती ,फोन करती ...

उन सबके बीच एक communication का एक खूबसूरत तरीका था ।missed call करने का .ये missed call का मतलब था -हमने आपको दिलसे याद किया है !!!सिलसिला यूँ ही चल पड़ा ....

आखिर वह दिन पास आने लगा । लड़कियोंने डाक्टर बन गई .इन्टर्न शिप का आखरी साल गुजरने लगा .अब थोड़े महीनों में सब अपने शहर लौटनेवाली थी . फ़िर कब जाने मुलाकात होगी ??

अब बातों में हलकी मायूसीकी झलक भी कभी दिख जाती थी । सब कभी इतवार को जयति को घर भी जाती .जयति उन्हें प्यारसे समजाती,"बेटे ! आप सब तो लड़कियां हो न !कुछ साल के बाद आपको माँ बाप का आँगन छोड़कर पंछी की तरह उड़ जाना है .आप सबका एक अलग संसार होगा , खुशियाँ होगी , अपनी उलझने होंगी ."

पायल भावुक हो जाती ।," आंटी हम सब आपको बहुत मिस करेंगे !!"

जयति कहती," बेटे ,जब आप सब मेरी उम्रके हो जाओगे तब आप सबको ये दिन बहुत याद आयेंगे । तब तुम्हे कोलेज के ये दिन सबसे खुबसूरत लगेंगे .और तब आपकी यादों में जरूर मुझे पाओगे . हम जुदा नहीं होंगे . हम तो एक दुसरे के दिलों में हमेशा के लिए बसे रहेंगे ..."

साल पुरा हो ही गया ॥

वह दिन भी आख़िरकार आ ही गया ...

सामान लेकर सब लड़कियां जाने से पहले आखरी बार मिलने जयति के घर उसे मिलने आई । सबने कल की शाम जयति के घर डिनर करके भरपूर गुजारी थी . सबके होठ हंस रहे थे . आख़िर घर वापस जाना था ! आँखे रो रही थी ॥

अब जयति पीछे वाली बालकनी में नहीं जाती । ये सब missed call करके ये अभी जताते है की हाँ हमने आपको दिलसे याद किया है .

एक दिन जयति को रोड एक्सीडेंट हो गया ।बचने की कोई उम्मीद नहीं थी .उसी वक्त हॉस्पिटल में हर वक्त की तरह पायल का miss call आया . जयतिने अपने बेटे को मोबाइल दिया .और कहा,"बेटे ! मेरी एक ख्वाहिश है की ये सिलसिला कभी न टूटे . तुम इनको मत बताना मेरे बारेमें ." पर जयति की जीवन की डोर टूट गई !!!उसके सेल फोन से अभी जवाबी miss call जरुर जाता था .

एक दिन पायल अपनी शादी का कार्ड लेकर जयति के घर आती है ।

दिल टूट गया ॥रो दिया ..

और एक missed call का खुबसूरत रिश्ता उसी लम्हेके साथ टूट गया ......

4 मई 2009

आज मेरे जनमदिन पर कुछ झाँका मैंने ...

वक्तके आयनेमें देख लूँ जरा

अब मेरे चेहरे का हाल क्या है ?

कितनी सिलवटे पड़ी है ? कितनी छुपी है ?

या कितने ज़ख्म भरे है ? कितनोंके निशां बाकी है ?

पलकोंमें जो सपने छूपे थे कभी

क्या वो आज भी आमादा है ?

या किरचें भी हो चुकी है उनकी ओज़ल ?

वो एक अज़ीज़ ख्वाब अभी है या है गुमशुदा ?

मेरे हाथोंमें लकीरें कुछ घिस गई है

मेरे बालों का रेशम थोड़ा खुरदरा हो चुका है ......

श्वेत झुल्फ़ की लड़ी झूल रही है रुखसार पर

नज़र के चश्मेके बगैर अब हर मंज़र धुंधला सा है ,

ये वक्त का तकाज़ा है ......

फ़िर भी दिल कहता है ....

अब भी हाथोंमें कुछ वक्त बाकी है ....

बस एक नए लम्हे सजा लीजे ....

समय के इस शामियानेमें फ़िर एक

नए ख्वाब का घरौंदा बना लीजे .....

3 मई 2009

शुक्रिया ,करम ,मेहरबानी ...

न कभी गिला करेंगे न शिकवा ,बस मोहब्बत है जिससे उसे जताना भी क्यों ?

एक गीला सा एहसास है बस ये दिल को बरबस भीग जाने का बहाना मिल गया कोई !!=========================================================

तराशना था जिंदगी को संगेमरमर सा , तपिश ने उसे सुलगा सा दिया है ,

और निखरसी गई जब आपके स्पर्शसे तराश दिया गया इस पत्थर को ,

पत्थर पर आ गई बहार फूल और बेले बनकर ,दुनिया सराहती गई उसे भी ,

नजरों को तलाश है उन हाथों की जिसकी निगाहों से आज दुनिया मुझे देख रही .....

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2 मई 2009

क्या ..उफ़ ये मोहब्बत !!!

नजाकतसे आपकी ये फूल क्यों शरमाया ?

ये क्या इल्म है इस हुस्नका जो चाँद ने भी करम फ़रमाया ?

गुजारिश करके देख ली आज आपके दीदार करके कलमको

क्या ये बेपनाह हुस्न शब्दोमें कैद कर पायेगी ?????

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मोहब्बत करते वक्त न पूछा इस नाचीज़ दिल को कभी ,

दिलका जब मिलना हुआ तो दिल खो जाने का ख़याल न रहा ,

निशान आपके कदमके ढूँढता फ़िर रहा हूँ यूँ गलियोंमें रहगुजरमें ,

तस्वीर आप ही की रहती है हरदम आंखोंके सामने

हो कभी उठती सुबह या ढलती शाम ही क्यों न हो !!!!

क्या इसे प्यार कहते है ? ये तो नहीं मालूम ...

बस इतना ही पता है जब सामना होता है आपसे

दीदार होता है आपका वही मेरी सहर होती है .....

1 मई 2009

दिलके अन्दर झांककर देखा जरा

आयनेके बाजूमें एक खुली हुई खिड़की है ,

जहाँ से कभी सर्द कभी गर्म हवाएं मुडी है ....

एक नजर जी भरके देख लिया आकाशके परिंदेको ,

मन भी उड़ चला और देखो मेरा चेहरा खुश हो चला ......

ख़ुशी को पा लिया लम्हे भर के लिए सही ,

दिलकी ख़ुशी होठों पर झाँखने लगी .......

आयनामें खड़ी वो मेरी परछाई भी ,

तहे दिल से मुस्कुराने लगी ....

विशिष्ट पोस्ट

मैं यशोमी हूँ बस यशोमी ...!!!!!

आज एक ऐसी कहानी प्रस्तुत करने जा रही हूँ जो लिखना मेरे लिए अपने आपको ही चेलेंज बन गया था । चाह कर के भी मैं एक रोमांटिक कहानी लिख नहीं पायी ...