5 नवंबर 2009

उफ़ ये फुनवा .....

नए फुनवाकी घंटी जब बजत थी ,

मन मयूर नाच जाता था ,

बिन मतलब हमार ऊँगली भी ढूंढ़ ढूंढ़के नम्बरवा घुमावत थी ,

पड़ोसी को दौड़ दौड़ बुलावा भेजत थे और सबको हमारा नंबर लिखवाते थे ......

आज वक्त बे वक्त ये फुनवा हमें दौडाता है ,

कभी नींद से जगाता है तो कभी स्नान या शौचालयसे भी निकलवाता है ....

जिंदगीके सारे झूठ बोलना ये हमें सिखा गया है ,

साफ़ सुनाई दे फ़िर भी नेटवर्कवा को भी ख़राब बुलवाता है ,

कभी रोंग नंबर कहकर बात टालते है ,

कभी फोनको दुश्मन कहकर पटक जाते है ...

पर एक आवाज हमें डरा जाती है वो जब सामने बीवी हो ,

ये वही आवाज हुआ करती थी जिसे सुनने हम रात भर जागा करते थे ....

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